पेशरार में गोलियां की तड़तड़ाहट नहीं, पक्षियों का कलरव

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पेशरार कभी डर और हिंसा का पर्याय था। यहां की हसीं वादियां नक्सलवाद के काले साये में सिसकती थीं। लेकिन आज बंदूक की गूंज की जगह पक्षियों का कलरव सुनाई देता है। दशकों के संघर्ष के बाद शांति ने अपने पंख फैलाए हैं। अब पेशरार शांत है, सुंदर है और विकास की राह पर अग्रसर है। लाल आतंक की समाप्ति ने स्थानीय लोगों में नई उम्मीदें जगाई हैं।

बात 1980 के दशक में शुरू हुई थी, तब नक्सलवाद ने तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) में अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी थी। पेशरार भी उसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। वर्ष 2000 में झारखंड राज्य गठन से ठीक पहले 4 अक्टूबर को पेशरार घाटी में वर्ष 1995 बैच के आईपीएस अजय सिंह को नक्सलियों ने गोली मार दी थी।

बेखौफ तेवरों वाले ये अधिकारी बिहार के पहले ऐसे आईपीएस थे, जो वर्दी में नक्सलियों के खिलाफ लड़ते हुए बलिदान हुए। उनके बलिदान ने बदलाव के अभियान की एक मजबूत नींव रखी। एक नया उदय हुआ और 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ और उसके साथ ही नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने का मिशन भी शुरू हुआ।

लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 2019 के आसपास पेशरार में शांति और सुरक्षा की स्थिति स्थापित हो गई। वर्ष 2023 आते-आते सब कुछ बदल गया। इसके बाद यहां विकास की धारा तेजी से बहने लगी।

कलम और लैपटाप उठा रहे

अब पक्की सड़कें गांवों को जोड़ रही हैं। बिजली हर घर तक पहुंच चुकी है। प्रखंड मुख्यालय में सरकारी कार्यालय पूरी तरह क्रियाशील हैं और आम लोग निडर होकर अपने कार्य कर पा रहे हैं। एक समय ऐसा भी था, जब ग्रामीण अपने बच्चों को नक्सली भय के कारण दूर भेज देते थे। आज वे पूरी निश्चिंतता से बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं। पेशरार में एकलव्य आवासीय विद्यालय स्थापित हो चुका है।

स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा हो रही है, स्मार्ट क्लास संचालित हैं। युवा अब कलम और लैपटाप उठा रहे हैं, बंदूक नहीं। स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए यहां बेहतर अस्पताल का निर्माण हो रहा है। नदियों पर पुल बन चुके हैं, जिससे आवागमन सुगम हुआ है।

दूरस्थ बसे गांव भी अब मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि पहले दिन के उजाले में भी अंधेरे का डर छाया रहता था, लेकिन अब विकास का शोर गांवों में सुनाई देता है। प्राकृतिक रूप से संपन्न पेशरार की वादियां पहले डर के कारण निर्जन रहती थीं। लेकिन अब यहां सैलानियों की चहलकदमी बढ़ गई है। शाम तक घाटियां पर्यटकों से गुलजार रहती हैं। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है।

हरियाली, जंगल और घाटियां

छोटे व्यवसाय फल-फूल रहे हैं और अर्थव्यवस्था में भी नई ऊर्जा का संचार हो रहा है। पेशरार की हरियाली, जंगल, घाटियां और झरने हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहे हैं। अब शांति के वातावरण ने इस सौंदर्य को फिर जीवंत कर दिया है। पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन विकास दोनों पर समान जोर दिया जा रहा है, ताकि यह प्राकृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों को भी सुरक्षित मिल सके।

आज पेशरार सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि पुनरुत्थान और उम्मीद की प्रेरणादायक कहानी है। सरकार के संकल्प, सुरक्षा बलों के साहस और स्थानीय लोगों के धैर्य ने मिलकर यह बदलाव संभव किया है। यह जीती-जागती मिसाल है कि शांति और विकास किसी भी अंधकार पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

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