सोने की बढ़ती कीमतों ने बदल दी शादी-ब्याह में गहनों की परंपरा! अब ये धार्मिक उपहार बने पहली पसंद

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सोने की लगातार बढ़ती कीमतों ने भारत में शादी-ब्याह की परंपराओं में एक बड़ा बदलाव ला दिया है। जहां पहले शादी में सोने के गहनों का भव्य आदान-प्रदान एक प्रतिष्ठा माना जाता था, अब कई समाजों में यह चलन बदल रहा है। लोग धार्मिक प्रतीकों, प्राकृतिक उपहारों और हल्के आभूषणों को प्राथमिकता दे रहे हैं। आर्थिक दबाव और सामाजिक जागरूकता ने मिलकर एक नई सोच को जन्म दिया है।

कहां-कहां बदले हैं रिवाज?

1. गुजरात — सोने की जगह तुलसी का पौधा

गुजरात के अहीर समाज ने सोने के महंगे गहनों की परंपरा खत्म कर अब शादी में तुलसी का पौधा भेंट करना शुरू कर दिया है। यह समाज इसे शुभ और प्रकृति-सम्मत मानता है।

2. दिल्ली — गीता और रामायण का उपहार

दिल्ली में कई समुदाय अब दुल्हन को सोना देने के बजाय श्रीमद्भगवद गीता या रामायण भेंट करते हैं, ताकि विवाह के साथ धार्मिक मूल्यों का भी संदेश दिया जा सके।

3. उत्तराखंड — गहनों पर कड़ा नियम

कंधार, जोनसार और इंद्राणी गांवों में फैसला हुआ है कि दुल्हन केवल तीन गहने ही पहनेगी: नथ,बाली और मंगलसूत्र। अगर कोई परिवार नियम तोड़ेगा, तो 50,000 रुपये तक का जुर्माना देना होगा।

राजस्थान, कच्छ और छत्तीसगढ़ — नई सोच, नए नियम

कच्छ (गुजरात)

अहीर समुदाय ने हल्के गहनों को बढ़ावा दिया है। भारी सोने के गहने अब लगभग बंद हो चुके हैं।

राजस्थान

कई समाजों ने गहनों के लेन-देन पर सीमा तय की है: मेवाड़ जाट महासभा, जाट समाज गुलाबपुरा, माली समाज, प्रगतिशील राजपूत सभा,कोली समाज, दाधीच समाज सेवा समिति (जोधपुर संभाग)। ये सभी समाज आभूषणों के अधिक आदान-प्रदान पर रोक लगाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

छत्तीसगढ़

साहू, कुर्मी और धोबी समाजों ने तय किया है कि शादी में केवल एक या दो हल्के गहने ही दिए जाएंगे। अग्रवाल समाज में तो सिर्फ एक अंगूठी को टीकावन का हिस्सा बनाया गया है।

साबरकांठा (गुजरात) — सोना और चांदी दोनों पर नियंत्रण

डूंगरी गरासिया समुदाय ने सोने के गहनों पर पूर्ण रोक और चांदी के गहनों का भी सीमित उपयोग का निर्णय लिया है।

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