झारखंड में खनिज कारोबार पर बढ़ा आर्थिक बोझ! कैप्टिव खदानों से बिक्री पर अब दोगुनी रॉयल्टी और सेस का भुगतान?

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झारखंड में खनिज कारोबार से जुड़ी कंपनियों और कैप्टिव खदानों के संचालकों के लिए खनन शुल्क का मुद्दा चर्चा में है। MMDR एक्ट में संशोधन के बाद खनिजों पर राज्य सरकारों की ओर से लगाए जाने वाले सेस को लेकर नए प्रावधान लागू हुए हैं। वहीं, कैप्टिव खदानों से खनिजों की बिक्री को लेकर अतिरिक्त भुगतान का प्रावधान भी महत्वपूर्ण हो गया है।

दरअसल, MMDR यानी माइंस एंड मिनरल्स डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट में 2026 के संशोधन के तहत राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों और खनिज-bearing भूमि पर अपनी ओर से टैक्स या सेस लगाने के अधिकार पर सीमाएं निर्धारित की गई हैं। नए प्रावधानों के मुताबिक, केंद्र सरकार की ओर से तय शर्तों के अलावा राज्य ऐसे नए शुल्क नहीं लगा सकते।

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MMDR एक्ट में क्या हुआ बदलाव?

MMDR संशोधन अधिनियम 2026 के नए प्रावधानों के तहत राज्य सरकारों द्वारा खनिज अधिकारों और खनिजयुक्त भूमि पर लगाए जाने वाले टैक्स, सेस और अन्य शुल्कों को नियंत्रित किया गया है। इसके लिए एक्ट में नई धारा 9D जोड़ी गई है।

इस प्रावधान के तहत संशोधन लागू होने से पहले की ऐसी बकाया वसूली भी अमान्य मानी जाएगी, जिसे राज्य ने पहले वसूल नहीं किया था। हालांकि, पहले से जमा या वसूल की गई रकम वापस नहीं होगी।

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कैप्टिव खदानों से खनिज बिक्री पर क्या नियम है?

कैप्टिव खदानें वे खदानें होती हैं, जिनका इस्तेमाल मुख्य रूप से किसी कंपनी के अपने उद्योग या उत्पादन संयंत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है।

MMDR के पहले के संशोधनों के बाद अब कैप्टिव खदानों से जुड़े खनिजों की बिक्री पर लगी सीमा हटाई गई है। हालांकि, इसके लिए संबंधित उद्योग की जरूरतों और निर्धारित अतिरिक्त भुगतान की शर्तें लागू होती हैं।

यदि कंपनी का अंतिम उपयोग वाला प्लांट पूरी क्षमता से काम कर रहा है, तो उससे जुड़ी जरूरतें पूरी करने के बाद खनिज बेचे जा सकते हैं। वहीं, प्लांट की क्षमता से कम उत्पादन की स्थिति में बिक्री की मात्रा पर अलग शर्त लागू होती है।

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झारखंड में क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

झारखंड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। राज्य की अर्थव्यवस्था में खनन से मिलने वाले राजस्व की महत्वपूर्ण भूमिका है।

झारखंड सरकार ने पहले खनिजयुक्त भूमि पर सेस लगाने के लिए कानून बनाया था। राज्य सरकार का तर्क रहा है कि खनिज संपदा का दोहन होने पर स्थानीय लोगों और प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए भी पर्याप्त संसाधन मिलने चाहिए।

MMDR संशोधन के बाद राज्य के इस राजस्व अधिकार को लेकर केंद्र और राज्य के बीच मतभेद भी सामने आए हैं। झारखंड के वित्त मंत्री ने राज्य के सेस लगाने के अधिकार को बहाल करने की मांग उठाई है।

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कंपनियों और खनन कारोबार पर क्या होगा असर?

नए नियमों के बाद खनन कंपनियों को रॉयल्टी, अतिरिक्त भुगतान और अन्य लागू शुल्कों की गणना नए प्रावधानों के अनुसार करनी होगी। इससे कैप्टिव खदानों से खनिज बेचने वाली कंपनियों के लिए भुगतान की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो गई है।

हालांकि, रॉयल्टी और सेस को दोगुना करने के दावे की पुष्टि के लिए संबंधित खनिज, दर और सरकारी अधिसूचना का विवरण जरूरी है। इसलिए इसे सभी कैप्टिव खदानों पर लागू एक समान नियम नहीं माना जाना चाहिए।

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