हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में किसानों ने खेती का एक अनोखा तरीका अपनाया है। यहां किसान पराली की मदद से आलू की खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस तकनीक में न तो खेत की जुताई की जरूरत पड़ती है और न ही पारंपरिक तरीके से सिंचाई करनी पड़ती है। खेती का यह प्रयोग किसानों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
आमतौर पर आलू की खेती के लिए खेत तैयार करने, मिट्टी की जुताई करने और समय-समय पर सिंचाई की जरूरत होती है। लेकिन ऊना के किसान अब पारंपरिक तरीके से हटकर एक नई तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें खेत में आलू के बीज रखकर उनके ऊपर पराली की परत बिछाई जाती है।
पराली की यह परत मिट्टी में नमी बनाए रखने और खरपतवार को नियंत्रित करने में मदद करती है। इससे किसानों को खेत की जुताई और सिंचाई पर होने वाली मेहनत कम करने की संभावना मिलती है।
इस तकनीक का एक और महत्वपूर्ण पहलू पराली का उपयोग है। जहां कई जगह फसल अवशेषों को किसानों के लिए परेशानी माना जाता है, वहीं ऊना के किसान इसी पराली को खेती में उपयोगी बना रहे हैं।
इस तरह की खेती से पानी की बचत, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार और खेती की लागत कम करने जैसे फायदे मिल सकते हैं। हालांकि, उत्पादन और सफलता मिट्टी, मौसम, पराली की उपलब्धता और खेती के सही प्रबंधन पर निर्भर करती है।
ऊना के किसानों का यह प्रयोग बताता है कि कृषि में नए तरीकों को अपनाकर संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर यह तकनीक सफल साबित होती है, तो आने वाले समय में दूसरे किसान भी इसे अपनाने में दिलचस्पी दिखा सकते हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

