स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का सत्ता पर तंज, बोले- ‘अंगद का पैर’ धर्म और सत्य का प्रतीक, सत्ता का नहीं
उत्तर प्रदेश के वाराणसी यानी काशी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ‘अंगद का पैर’ को लेकर अहम बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अंगद का पैर धर्म और सत्य का प्रतीक है, सत्ता का नहीं। उनके इस बयान को लेकर धार्मिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है।
काशी में अपने संबोधन के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए अंगद के पैर का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अंगद का पैर धर्म, सत्य और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। इसे सत्ता या शक्ति के प्रदर्शन से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
रामायण के अनुसार, अंगद भगवान राम के दूत बनकर रावण की सभा में पहुंचे थे। वहां उन्होंने अपना पैर जमाकर रावण की सेना को चुनौती दी थी। यह प्रसंग सत्य और धर्म के प्रति अडिग रहने के संदेश के रूप में देखा जाता है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसी प्रसंग के माध्यम से अपने विचार रखे। उनके बयान का मुख्य संदेश यह था कि वास्तविक मजबूती सत्ता में नहीं, बल्कि धर्म और सत्य के रास्ते पर दृढ़ रहने में है। किसी व्यक्ति या व्यवस्था की ताकत का आकलन केवल उसके अधिकार और प्रभाव से नहीं किया जा सकता।
उनके इस बयान के सामने आने के बाद एक बार फिर अंगद के पैर से जुड़े रामायण के प्रसंग और उसके प्रतीकात्मक अर्थ पर चर्चा हो रही है। काशी में दिया गया यह वक्तव्य धार्मिक संदेश के साथ-साथ मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों में भी देखा जा रहा है।
फिलहाल, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह बयान चर्चा में है। उन्होंने अंगद के पैर के उदाहरण से धर्म और सत्य की महत्ता को रेखांकित किया है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

