हरियाणा के रोहतक की पुरानी मंडी में आज भी एक ऐसा पारंपरिक हुनर देखने को मिलता है, जो लोगों को पुराने दौर की मिठास याद दिला देता है। यहां चाशनी की छोटी-छोटी बूंदों से गोल-मटोल बताशे तैयार किए जाते हैं। खास बात यह है कि यह कला कोई नई नहीं, बल्कि करीब तीन पीढ़ियों से चली आ रही है।
बताशे बनाने की यह पारंपरिक प्रक्रिया अपने आप में बेहद खास है। कारीगर पूरी कुशलता के साथ चाशनी तैयार करते हैं और फिर उसे खास तरीके से बूंदों के रूप में ढालते हैं। धीरे-धीरे यही बूंदें आकार लेकर गोल-मटोल बताशों में बदल जाती हैं।
इस काम में अनुभव और हाथों की सफाई सबसे ज्यादा मायने रखती है। चाशनी की सही बनावट, तापमान और उसे सही आकार देने की कला ही बताशों को खास बनाती है। यही वजह है कि मशीनों के दौर में भी इस पारंपरिक तरीके का अपना अलग महत्व बना हुआ है।
रोहतक की पुरानी मंडी में यह हुनर सिर्फ मिठाई बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तीन पीढ़ियों की मेहनत, अनुभव और विरासत की कहानी भी है। परिवार की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंची यह कला आज भी लोगों को आकर्षित कर रही है।
आज जब बाजार में तरह-तरह की आधुनिक मिठाइयां उपलब्ध हैं, ऐसे में पारंपरिक बताशों का स्वाद और उन्हें बनाने का देसी अंदाज अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
रोहतक की पुरानी मंडी के ये बताशे साबित करते हैं कि कुछ हुनर ऐसे होते हैं, जिनकी मिठास समय के साथ कम नहीं होती। तीन पीढ़ियों से संभाली जा रही यह परंपरा आज भी भारतीय पारंपरिक मिठाई संस्कृति की खूबसूरत मिसाल बनी हुई है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

