जम्मू के वन क्षेत्रों में रोहिंग्या बस्तियों को लेकर सवाल, पहचान और सत्यापन प्रक्रिया पर उठी चिंता
जम्मू में वन क्षेत्रों और सरकारी जमीन पर रह रहे लोगों की पहचान और सत्यापन को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। रोहिंग्या आबादी के कुछ समूहों के वन क्षेत्र में रहने और किराये पर बिजली-पानी जैसी सुविधाएं लेने से जुड़े दावों ने प्रशासनिक व्यवस्था और सत्यापन प्रक्रिया पर चर्चा तेज कर दी है।
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की पहचान और उनके दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया। जम्मू-कश्मीर में बाहरी लोगों और किरायेदारों के सत्यापन को लेकर प्रशासन और पुलिस पहले भी अभियान चला चुके हैं। जून 2026 में सांबा जिले में किरायेदारों और घरेलू सहायकों का विवरण उपलब्ध नहीं कराने पर 19 संपत्ति मालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
वहीं, जम्मू के वन क्षेत्रों में अतिक्रमण और वहां रहने वाले परिवारों को लेकर भी प्रशासनिक कार्रवाई और विवाद सामने आए हैं। मई 2026 में सिदड़ा-राइका इलाके में कई ढांचों को हटाए जाने के बाद वन अधिकार कानून के तहत दावों और उनके सत्यापन को लेकर जांच की मांग उठी थी।
जम्मू-कश्मीर सरकार ने बाद में स्पष्ट किया कि वन भूमि पर रहने वाले अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों के दावों की पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उन्हें हटाने की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। इसके लिए वन अधिकार कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के निर्देश दिए गए हैं।
ऐसे में वन क्षेत्रों में रहने वाले अलग-अलग समूहों की पहचान, दस्तावेजों की जांच और भूमि पर उनके अधिकारों का निर्धारण नियमों के मुताबिक करना महत्वपूर्ण हो गया है। रोहिंग्या आबादी से जुड़े दावों के साथ-साथ स्थानीय वनवासियों के अधिकारों और प्रशासनिक सत्यापन की प्रक्रिया पर भी नजर बनी हुई है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

