मध्य प्रदेश की स्थापना की कहानी जब भी लिखी जाएगी, उसमें पंडित रविशंकर शुक्ल का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगा। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी से लेकर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर त्याग, संघर्ष और दूरदर्शी नेतृत्व की मिसाल है। 1 नवंबर 1956 को जब नए मध्य प्रदेश का गठन हुआ, तब राज्य की बागडोर पंडित रविशंकर शुक्ल को सौंपी गई।
सागर में जन्म, अध्यापन से शुरू हुआ सार्वजनिक जीवन का सफर
पंडित रविशंकर शुक्ल का जन्म 2 अगस्त 1877 को सागर में पंडित जगन्नाथ शुक्ल के घर हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा सागर और रायपुर में हुई। इसके बाद उन्होंने जबलपुर के रॉबर्टसन कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और कानून की शिक्षा हासिल की।
करियर की शुरुआत उन्होंने अध्यापन से की। बाद में रायपुर में वकालत करने लगे। इसी दौरान उनका जुड़ाव राष्ट्रीय आंदोलन और सार्वजनिक जीवन से गहरा होता चला गया। महात्मा गांधी और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में सक्रिय भागीदारी की।
तीन बड़े आंदोलनों में निभाई सक्रिय भूमिका, कई बार गए जेल
पंडित रविशंकर शुक्ल ने स्वतंत्रता संग्राम के कई महत्वपूर्ण पड़ावों पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वर्ष 1920 के असहयोग आंदोलन, 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही।
ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाने और आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी।
सीपी एंड बेरार के प्रधानमंत्री से बने मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री
आजादी से पहले ही पंडित रविशंकर शुक्ल अपनी प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक अनुभव के कारण अलग पहचान बना चुके थे। वर्ष 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद उन्हें सेंट्रल प्रोविंसेज एंड बेरार में शिक्षा मंत्री बनाया गया। इसके बाद 1938 में उन्होंने वहां प्रधानमंत्री का पद संभाला। उस दौर में मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था।
वर्ष 1946 से 1956 तक उन्होंने लगातार इस पद पर रहते हुए प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं। उनके लंबे अनुभव का लाभ नए मध्य प्रदेश को मिला।
1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन के बाद महाकौशल, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल को मिलाकर मध्य प्रदेश का गठन हुआ। इसके साथ ही पंडित रविशंकर शुक्ल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। नए राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित करने और राजधानी भोपाल में शासन के बुनियादी ढांचे को विकसित करने में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा।
हिंदी और शिक्षा के प्रसार के प्रबल समर्थक थे
राजनीति में ऊंचे पदों पर रहने के बावजूद पंडित रविशंकर शुक्ल का जीवन सादगी और अनुशासन से जुड़ा रहा। वे हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक थे और शिक्षा के विस्तार को समाज की प्रगति का महत्वपूर्ण आधार मानते थे।
रायपुर स्थित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय का नामकरण उनके सम्मान और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान की याद दिलाता है।
मध्य प्रदेश बनने के दो महीने बाद ही दुनिया को कहा अलविदा
नवगठित मध्य प्रदेश को संभालने की जिम्मेदारी मिलने के महज दो महीने बाद ही पंडित रविशंकर शुक्ल का निधन हो गया। 31 दिसंबर 1956 को नई दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से उनका आकस्मिक निधन हुआ।
उनके जाने से नवगठित प्रदेश ने एक अनुभवी प्रशासक और मार्गदर्शक खो दिया। हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान, प्रशासनिक अनुभव और मध्य प्रदेश के निर्माण में निभाई गई भूमिका आज भी उन्हें प्रदेश के इतिहास की महत्वपूर्ण शख्सियतों में शामिल करती है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

