अखिलेश यादव के ‘घुसपैठिये’ ने पुराने जख्मों पर फिर छिड़का नमक, उत्तराखंड में ‘साइकिल पंचर’

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उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी की साइकिल ढाई दशक से सियासी पगडंडी पर ही डगमगा रही है। कभी हरिद्वार से लोकसभा सीट जीतकर संसद तक पहुंचने वाली पार्टी आज महज 0.29 प्रतिशत वोट पर सिमट चुकी है। ऐसे में अखिलेश यादव के एक बयान ने उसकी राजनीतिक राह में नए कांटे बिछा दिए हैं।

उत्तर प्रदेश में सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिशों के बीच अखिलेश यादव का उत्तराखंड के लोगों को लेकर दिया गया ””घुसपैठिये”” वाला बयान ऐसे समय आया है, जब राज्य में रामपुर तिराहा कांड की सियासी छाया से जूझ रही सपा अपना खोया जनाधार तलाशने की जद्दोजहद कर रही है।

लखनऊ में शुक्रवार को मीडिया से बातचीत के दौरान अखिलेश ने उत्तर प्रदेश में घुसपैठियों के सवाल पर उत्तराखंड के लोगों का जिक्र किया। इस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कड़ी आपत्ति जताते हुए सार्वजनिक माफी की मांग की। ऐसे में राजनीतिक सवाल यह है कि जिस राज्य में सपा पहले ही अपनी जमीन खो चुकी है, वहां ऐसे बयान पार्टी की वापसी की उम्मीदों को कितना नुकसान पहुंचाएंगे।

उत्तराखंड गठन के बाद 2002 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 56 सीटों पर चुनाव लड़कर करीब 7.89 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। कई सीटों पर मुकाबला भी दिलचस्प रहा, परंतु पार्टी विधानसभा में खाता नहीं खोल सकी। 2004 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से जीत ने उम्मीद जगाई, मगर यह कामयाबी स्थायी जनाधार में नहीं बदल सकी।

2007 में वोट प्रतिशत करीब 6.5 रहा। 2012 में यह घटकर लगभग 1.5 प्रतिशत पर आ गया। 2017 में संगठन और कमजोर हुआ, इस चुनाव में सपा ने 18 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे कुल 0.37 प्रतिशत वोट शेयर मिला था।। 2022 के विधानसभा चुनाव में 55 सीटों पर लड़ने के बावजूद सपा को महज 0.29 प्रतिशत वोट मिले। यानी ढाई दशक में साइकिल का सफर संसद की एक जीत से सियासी हाशिये तक पहुंच गया।

रामपुर तिराहे की छाया अब भी कायम

हरिद्वार : सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कमजोर संगठन के साथ उत्तराखंड राज्य आंदोलन से जुड़ी उसकी राजनीतिक छवि भी है। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में 1994 के रामपुर तिराहा कांड में आंदोलनकारियों पर गोलीबारी और सामूहिक दुष्कर्म जैसी घटना राज्य की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है। भाजपा इस विरासत को लगातार सपा के विरुद्ध मुद्दा बनाती रही है। अब अखिलेश के बयान ने इसी संवेदनशील मुद्दे को फिर हवा दे दी है।

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