रूस से तनाव के बीच आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ाएगा यूरोपीय संघ, भारत पर भी पड़ सकता है असर

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यूरोपीय संघ आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा मजबूत करेगा। इसके लिए संघ ने नई रणनीति पेश की गई है। जलवायु परिवर्तन की वजह से बर्फ तेजी से पिघल रही है और आर्कटिक में नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं।

इसलिए उपग्रहों की निगरानी बढ़ाने, पाइपलाइनों की सुरक्षा और समुंद्र के नीचे बिछी संचार केबलों की सुरक्षा पहली प्राथमिकता होगी। इसके लिए नए केंद्र भी बनाने पर विचार चल रहा है। आर्कटिक में बदलते हालात भारत के लिए भी अहम हैं।
आर्कटिक भारत के लिए मौसम में बदलाव, मानसून के साथ जल और खाद्य सुरक्षा जैसे मसलों के लिए अहम स्थान रखता है। भारत ने इसके लिए 2022 की नीति के तहत इस बात पर जोर भी दिया है। भारत की आर्कटिक नीति इसे एक बर्फीला स्थान नहीं मान कर इसे अपने यहां की कई चीजों से जुड़ा मानता है

आर्कटिक समुद्री मार्ग के जरिए भारत रूस की प्राकृतिक गैस लाने की कोशिश में जुटा है। वहीं,नॉर्वे के स्वालबार्ड में भारत का हिमाद्रि अनुसंधान केंद्र इस दिशा में वैज्ञानिक अध्ययन करता है। यूरोप और एशिया के बीच की दूरी भी कम करने की कोशिश हो रही है।

यूरोप की नई रणनीति के पीछे दो अहम कारण है। इसमें पहला कारण आर्कटिक का गर्म होना है और दूसरे बदलते हालात। ताजा रिपोर्ट के अनुसार ये इलाका पहले के मुकाबले (ग्लोबल एवरेज) से लगभग चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है। इस दौरान पिघलती हुई बर्फ कुछ रास्तों को आसान बना रही हैं।

यूरोपियन पार्लियामेंट्री रिसर्च सर्विस ने कहा कि यूक्रेन पर रूस के हमले ने आर्कटिक सहयोग को पहले के मुकाबले कमजोर कर दिया है। इससे अविश्वास बढ़ा है। आर्कटिक में पहले के मुकाबले ज्यादा ट्रैफिक हो रहा है। इसलिए ज्यादा गतिविधियां भी सतर्कता की ओर इशारा करती हैं।

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