दीवाली एक ऐसा त्योहार है, जब भारत के सभी राज्यों में अलग-अलग परंपराओं और खान-पान की झलक देखने को मिलती है। कहीं खील-बताशों के बिना पूजा अधूरी है, तो कहीं शक्करपारा और नारियल के लड्डू पारंपरिक पकवान में शामिल हैं। इन्हीं में से एक मिठाई है अनरसा जो बिहार और महाराष्ट्र दोनों राज्यों में दीवाली के शुभ दिन पर बनाई जाती है।
गया में बनी थी पहली बार अनरसा मिठाई?
हम सभी ने गया के फेमस तिलकुट के बारे में तो बहुत बार सुना है, लेकिन इसके बाद अगर कोई मिठाई गया की पहचान बनी है, तो वो है अनरसा। कहते हैं कि टिकारी महाराज मुगलों के दौर में बिहार के गया जिले के राजा और प्रभावशाली जमींदार थे। उन्हीं के समय में अनरसा बनाए जाने की शुरुआत हुई।
अरवा चावल के आटे, खोया, तिल और चीनी से बनने वाले इस व्यंजन को महाराज अपने किलों में विशेष करीगरों से बनवाया करते थे। कहा यह भी जाता है कि उस समय अनरसा दिखने में भी अलग था, क्योंकि यह रोटी के आकार का पतला और बीच में छेद वाला व्यंजन हुआ करता था।
ऐसा भी माना जाता है कि अनरसा मिठाई की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के डमरुआ गांव से हुई। वहीं, महाराष्ट्र में अनरसा एक मिठाई नहीं, दीवाली पर लक्ष्मी पूजा के दौरान अर्पित किया जाने वाला नेवैद्य है। महाराष्ट्र की परंपरा में यह मिठाई माता लक्ष्मी का स्वागत करने के लिए खासतौर से बनाई जाती है। इसके अलावा, अनरसा ट्रेडिशनल महाराष्ट्रीयन ‘फराल’ में भी खास पकवान है, जिसे परिवार और दोस्तों को परोसा जाता है।
भगवान शिव को प्रिय है यह मिठाई
अनरसा का पौराणिक महत्व भी खूब बताया जाता है, कहते हैं कि माता पार्वती ने साधना करते समय भगवान शिव को पाने के लिए इसी मिठाई का भोग लगाया था। तब से ही भोलेनाथ को यह मिठाई सबसे अधिक प्रिय है। धार्मिक महत्व की वजह से ही दीवाली के अलावा तीज और छठ महापर्व जैसे बड़े मौकों पर अनरसा बनाए जाने की खास परंपरा भी है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

