610 करोड़ रुपये की लागत से नियंत्रित होगी आबादी, यूपी में हर साल 15% मादा तेंदुओं की होगी नसबंदी
बाघों के डर से जंगल से भागे तेंदुए आबादी क्षेत्र में शिकार कर रहे। गांवों के आसपास इनकी लगातार बढ़ती संख्या मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पैदा कर सकती है।
इस चिंता को दूर करने के लिए वन विभाग नर मादा तेंदुओं की नसबंदी कराएगा। मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने बिजनौर जिले के लिए इसका प्रस्ताव बनाकर भेजा, जो कि केंद्र सरकार के पास पहुंच चुका है। अब वहां से अनुमति मिलने के बाद प्रतिवर्ष 15 प्रतिशत मादा तेंदुओं की नसबंदी शुरू करा दी जाएगी।
बहराइच में कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य और वन प्रभाग के आसपास के गांवों में भी संघर्ष हो चुका। पीलीभीत टाइगर रिजर्व से निकले तेंदुओं ने कई पशुओं का शिकार किया, हालांकि मानव पर हमला नहीं हुआ।
इसी तरह जिम कार्बेट, राजाजी, अमानगढ़, दुधवा, कतर्नियाघाट टाइगर रिजर्व में बाघों संख्या बढ़ने से तेंदुए आबादी क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं। वन विभाग के कर्मचारी इन्हें रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ देते, मगर वे शिकार की तलाश में गांवों में लौट आते हैं। प्रदेश के चिड़ियाघरों में इन्हें रखने की जगह नहीं बची।
ऐसे में बरेली जोन के मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने बताया कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत बिजनौर जिले के लिए प्रस्ताव तैयार किया गया। यह प्रस्ताव प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अनुराधा वेमूरी को सौंपा। उनके माध्यम से केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भेजा जा चुका।
मुख्य वन संरक्षक ने बताया कि तेंदुए वर्ष भर प्रजनन करते हैं। मादा तेंदुआ 90 से 105 दिनों के गर्भकाल के बाद दो से चार शावकों को जन्म देती हैं। इनमें 20 प्रतिशत शावकों की मौत जाती है। प्रदेश में नर व मादा तेंदुओं की संख्या बराबर है।
इनकी आबादी पर नियंत्रण लगाने के लिए मादा तेंदुओं की नसबंदी का प्रस्ताव बनाया। इस पर 610 करोड़ रुपये खर्च होंगे। प्रस्ताव के अनुसार, तेंदुओं को आबादी में पहुंचने से रोकने के लिए अवरोध बनाए जाएंगे। इसमें ध्यान रखा जाएगा कि तेंदुओं का गलियारा ने प्रभावित हो।
मादा तेंदुओं को पकड़कर नसबंदी कराई जाएगी। इसके लिए 2.74 करोड़ रुपये से विशेष वन्यजीव सर्जिकल अस्पताल बनेगा। नसबंदी के बाद उन्हें अमानगढ़ और नजीबाबाद के जंगल में छोड़ा जाएगा।
इनकी आवाजाही पर नजर रखने के लिए थर्मल कैमरे जिला कमांड सेंटर से जोड़े जाएंगे। इस प्रक्रिया में भारतीय वन्यजीव संस्थान और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया से सुझाव मांगे जा चुके। पिछले वर्ष महाराष्ट्र में मादा तेंदुओं की नसबंदी शुरू हो चुकी। हालांकि, पीलीभीत, बहराइच, लखीमपुर खीरी, मुरादाबाद जिलों में तेंदुआ का आतंक बरकरार है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

