ग्लैमर से परे, अपनी शर्तों पर किया काम; हिंदी सिनेमा की ‘मर्दानी’ Rani Mukerji के सफर पर एक नजर
हिंदी सिनेमा में अपनी शर्तों पर तीन दशक बिताना कोई छोटी बात नहीं है, लेकिन रानी मुखर्जी (Rani Mukerji) ने इसे कर दिखाया है। आज दुनिया उन्हें मर्दानी (Mardaani) सीरीज की जांबाज पुलिस अफसर शिवानी शिवाजी राय जैसी जबर्दस्त भूमिकाओं से पहचानती है।
साल 1996 में किया था डेब्यू
मगर इस सफलता के पीछे एक ऐसी साहसी अभिनेत्री छिपी है, जिसने अधिकतर लीक से हटकर चौंकाने वाले रोल चुने। आज से 30 साल पहले 18 अक्टूबर 1996 को प्रदर्शित अपनी पहली ही फिल्म ‘राजा की आयेगी बारात’ में उन्होंने एक ऐसी लड़की का दर्द जिया, जिसे अपने बलात्कारी से शादी करनी पड़ती है। वहीं अइय्या में वह एक ऐसी प्रेम दीवानी बनीं, जो सिर्फ खुशबू के अहसास पर अपना दिल हार बैठती है।
नामचीन परिवार से है रानी का नाता
फिल्मी परिवार की विरासत रानी के खून में सिनेमा दौड़ता है। वह झांसी के नामचीन मजिस्ट्रेट रवींद्र मोहन मुखर्जी के पोते और निर्देशक राम मुखर्जी की बेटी हैं। उनके बड़े पापा शशधर मुखर्जी ने बांबे टाकीज और फिल्मिस्तान जैसे ऐतिहासिक स्टूडियोज की नींव रखी थी, जिन्होंने भारतीय सिनेमा का सुनहरा दौर गढ़ा। उनके पिता ने दिलीप कुमार को लेकर सुपरहिट फिल्म लीडर बनाई थी।
सुपरस्टार काजोल उनकी चचेरी बहन हैं। इतनी बड़ी फिल्मी विरासत होने के बाद भी रानी इस दुनिया में कदम नहीं रखना चाहती थीं। वह अक्सर कहती थीं, घर में पहले से ही इतनी अभिनेत्रियां हैं, मुझे कुछ अलग करना है। लेकिन मां कृष्णा मुखर्जी की मनुहार के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने अभिनय को महज एक प्रयोग की तरह शुरू किया।
चॉकलेटी हीरोइन से आगे
शुरुआती सफर आसान नहीं था। उनकी पहली फिल्म बाक्स आफिस पर कोई खास कमाल नहीं दिखा सकी। पहचान मिली विक्रम भट्ट की गुलाम से, जिसमें आती क्या खंडाला गाने ने उन्हें रातों-रात हर दिल अजीज बना दिया, हालांकि वह पूरी तरह आमिर खान की फिल्म थी। इसके बाद करण जौहर की ब्लाकबस्टर फिल्मों कुछ कुछ होता है और कभी खुशी कभी गम ने उन्हें सफलता का स्वाद चखाया।
फिर तो चलते चलते, हम तुम और वीर-जारा जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा की रोमांटिक क्वीन बना दिया। मगर रानी सिर्फ पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचने वाली पारंपरिक हीरोइन बनकर खुश नहीं रहने वाली थीं। उनके भीतर का कलाकार कुछ और ही तलाश रहा था।
हर रोल में दिखाया दम
साल 2000 में आई बादल, बिच्छ और कमल हासन की हे राम जैसी फिल्मों से रानी ने साफ कर दिया कि वह पुरुषों के वर्चस्व वाली एक्शन फिल्मों में भी धाक जमा सकती हैं। इसके बाद मणिरत्नम की राजनीतिक थ्रिलर युवा में एक प्रताड़ित पत्नी का किरदार हो या संजय लीला भंसाली की ब्लैक में हेलेन केलर से प्रेरित एक मूक-बधिर लड़की का जीवंत अभिनय, रानी ने हर रोल में दर्शकों को झकझोरा
उन्होंने बहुत ही संजीदगी से व्यावसायिक सिनेमा के ग्लैमर और समानांतर सिनेमा की गहराई के बीच संतुलन बनाया। दिल बोले हड़िप्पा में क्रिकेट खेलने की खातिर लड़के का भेष बदलना हो, या तलाश में एक ऐसी मां का दर्द जीना हो जो अपने मासूम बच्चे की मौत के सदमे से उबर नहीं पाती-रानी ने हर रूप में खुद को ढाला। हालांकि इनमें से कई फिल्में टिकट खिड़की पर नाकाम रहीं, लेकिन रानी के किरदारों की धार कभी कम नहीं हुई।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

