‘पैसे के समझौते पर जमानत नहीं दी जा सकती’, दिल्ली हाई कोर्ट का अहम फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने बैंक धोखाधड़ी से जुड़े एक मामले में जमानत को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को शिकायतकर्ता के साथ हुए वित्तीय समझौते को पूरा करने की शर्त पर जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि जमानत पर फैसला करते समय मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और अन्य प्रासंगिक तथ्यों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति संजीव नरुला की पीठ ने सत्र अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें समझौते के तहत भुगतान नहीं किए जाने को जमानत रद्द करने का आधार बनाया गया था। हाई कोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए ट्रायल कोर्ट भेजते हुए आरोपी की जमानत याचिका पर मामले की खूबियों के आधार पर नए सिरे से फैसला करने का निर्देश दिया।
50 लाख रुपये की बैंक धोखाधड़ी का मामला
यह मामला 2018 में आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज किया गया था। आरोपी गुरमीत सिंह पर धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश समेत विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
आरोप था कि जाली दस्तावेजों के आधार पर बैंक से 50 लाख रुपये की कैश-क्रेडिट सुविधा हासिल की गई। आरोपी को अगस्त 2022 में गिरफ्तार किया गया था और नवंबर 2022 में उसे जमानत मिली थी। जमानत के दौरान दोनों पक्षों के बीच वित्तीय समझौता हुआ था।
बाद में समझौते के अनुसार भुगतान नहीं होने पर बैंक ने जमानत रद्द करने की मांग की। सत्र अदालत ने बैंक की मांग स्वीकार कर ली थी। इसके बाद मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा।
जमानत का फैसला किन आधारों पर होगा?
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी वित्तीय समझौते का पालन नहीं होना अपने आप में जमानत देने या रद्द करने का आधार नहीं हो सकता। जमानत याचिका पर फैसला करते समय अदालत को आरोपी के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों और मामले से जुड़े अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार करना चाहिए।
इस फैसले के बाद ट्रायल कोर्ट को आरोपी की जमानत याचिका पर मामले की मेरिट के आधार पर नए सिरे से विचार करना होगा।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

