छात्रसंघ चुनाव में जेन-जी फैक्टर: पुराने नारे, नए मतदाता और बदलती चुनावी शैली
छात्रसंघ चुनाव में जेन-जी फैक्टर: पुराने नारे, नए मतदाता और बदलती चुनावी शैली
छात्रसंघ चुनाव एक बार फिर विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों में राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन रहे हैं। हालांकि चुनावी मैदान में इस बार भी पोस्टर, नारे और प्रचार के पारंपरिक तौर-तरीके दिखाई दे रहे हैं, लेकिन मतदाताओं की नई पीढ़ी चुनावी माहौल में एक अहम बदलाव लेकर आई है। जेन-जी यानी नई पीढ़ी के छात्र अब छात्रसंघ चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाने वाले मतदाताओं के रूप में सामने आ रहे हैं।
छात्र राजनीति में लंबे समय से इस्तेमाल किए जाने वाले मुद्दे और नारे आज भी चुनाव प्रचार का हिस्सा हैं। छात्र संगठन शिक्षा, रोजगार, फीस, छात्र सुविधाओं और कैंपस से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। दूसरी ओर, नई पीढ़ी के मतदाताओं की प्राथमिकताएं और संवाद के तरीके पहले की तुलना में अलग नजर आते हैं।
जेन-जी छात्र सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए राजनीतिक गतिविधियों और उम्मीदवारों की जानकारी हासिल कर रहे हैं। ऐसे में छात्रसंघ चुनाव का प्रचार भी केवल कैंपस तक सीमित नहीं रह गया है। उम्मीदवार और छात्र संगठन सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और डिजिटल कैंपेन के जरिए छात्रों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
नई पीढ़ी के मतदाताओं के सामने रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, फीस, परीक्षा व्यवस्था, कैंपस सुविधाएं, डिजिटल संसाधन और भविष्य की संभावनाएं जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में छात्रसंघ चुनावों में पारंपरिक नारों के साथ इन नए मुद्दों को लेकर भी चर्चा बढ़ रही है।
छात्रसंघ चुनावों का बदलता स्वरूप यह संकेत देता है कि कैंपस की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव दिखाई दे रहा है। पुराने चुनावी तौर-तरीकों और नई पीढ़ी की अपेक्षाओं के बीच तालमेल बैठाना उम्मीदवारों और छात्र संगठनों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। यही वजह है कि इस बार छात्रसंघ चुनावों में जेन-जी फैक्टर चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

