कांगड़ा घाटी रेलवे: ब्रॉडगेज करने की आवाज के बीच नैरागेज ट्रैक पर भी सन्नाटा, कब तक धीरज धरे धूलि धूसरित धरोहर?
हिमाचल प्रदेश की एक प्रसिद्ध कहावत ‘बालुए जो रोंदी थी, नक्के ते भी गई’ यानी नाक के लौंग या बाली के लिए रोती थी लेकिन नाक से ही हाथ धोना पड़ा…। पठानकोट-जोगेंद्रनगर रेलमार्ग ब्राडगेज करने की आवाजों के बीच जो नैरो गेज बचा था, वह भी रेलगाड़ियों से वंचित हो गया है। स्टेशन सुन्न हैं, पटरी पीड़ित है और राजनीति के दावे नित गूंजते हैं कि सर्वेक्षण अब हुआ कि अब हुआ।
यह बात शानन प्रोजेक्ट को बनाने वाले कर्नल बीसी बैट्टी, माल ढुलाई के लिए पठानकोट से जोगेंद्रनगर तक रेलमार्ग बिछाने वाले कार्य अधीक्षक ईबीएन टेलर और ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे (अब सेंट्रल रेलवे) के एक इंजीनियर नील की स्मृति को साक्षी रख कर कही जा सकती है कि हिमाचल प्रदेश के इस 164 किलोमीटर (सबसे लंबे) रेलमार्ग को एक अश्विनी वैष्णव न सही, कुछ समय पहले तक रेल राज्य मंत्री रहे रवनीत सिंह बिट्टू की बड़ी जरूरत थी।
बिट्टू होना क्या है…यह इससे जाना जा सकता है कि पठानकोट वालों को लगा कि हिमाचल जाने वाली गाड़ियों के कारण शहर के व्यस्त क्षेत्रों में फाटक बंद हो जाते हैं और शहर बार-बार ठिठकता है। सो अब रेल चलेगी तो हिमाचल की सवारियों के लिए पठानकोट का अर्थ हिमाचल का अंतिम बिंदु डलहौजी रोड होगा। यानी मूल पठानकोट स्टेशन से 10 किलोमीटर पहले।
आइए देखें कि 1926 से 1929 के बीच बने, 990 पुलों, दो सुरंगों और 500 मोड़ों वाले इस रेलमार्ग के इतिहास में अब ऐसा मोड़ क्यों आया है कि धरोहर बनने के बिंदु पर खड़े इस मार्ग पर डरावना सन्नाटा है।
4 साल पहले चक्की पुल हुआ ध्वस्त
हुआ यूं कि चार साल पहले पहले पठानकोट के पास पंजाब को हिमाचल प्रदेश से जोड़ने वाला चक्की पुल ध्वस्त हुआ। उपलब्ध फोटो और आम समझ के अनुसार इसके पीछे अवैध खनन था पर आधिकारिक रूप से ऐसा जोर शोर से तो नहीं, ‘नाम न छापने की शर्त पर’ ही माना गया।
ठप रहा परिचालन
चार वर्ष तक रेल परिचालन ठप रहा। पुल बना तो चार जून को रेल सेवा प्रारंभ हुई। कई सांसदों-विधायकों ने इसे हरी झंडी दिखाई। यह झंडी ब्राडगेज के लिए या पूर्ववत सात गाड़ियां चलाने की प्रसन्नता में नहीं, इसलिए दिखाई गईं कि दो रेलगाड़ियां चलेंगी। जून के बाद जुलाई की बरसात आई, कुछ स्थानों पर ल्हासे गिरे और ये दो रेलगाड़ियां भी बंद।
कई संभावनाएं
इस मार्ग को ब्राडगेज करके मंदिरों से जोड़ा जा सकता है, पर्यटन स्थलों से जोड़ा जा सकता है, मंडी तक पहुंचा दें तो रणनीतिक लाभ भी होगा। मंदिर दर्शन के अलावा साहसिक पर्यटन के इच्छुक आते हैं, दलाईलामा का अलग आकर्षण है, चाय पर्यटन है, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच हैं, वेलनेस के लिए लोग कांगड़ा घाटी का रुख कर रहे हैं…… क्या रेलवे इन्हें संभावनाएं नहीं मानता? सब बिंदु कांगड़ा से लोकसभा सदस्य डॉ. राजीव भारद्वाज संसद में रख चुके हैं।
यह रहस्य नहीं कि इस मार्ग पर कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां ट्रेन ही सुविधाजनक है। शानन परियोजना से आर्थिक लाभ कांगड़ा घाटी रेलवे को क्यों न मिले। शानन की लीज भी समाप्त है…।
2025 के बाद 26 में भी उठा मामला
2025 में तत्कालीन राज्यसभा सदस्य इंदु गोस्वामी को रेलमंत्री ने बताया था कि गेज बदलने से संबंधित परियोजना रपट बन रही है, उसे राज्य सरकार को भी भेजेंगे। 2026 में डा. राजीव भारद्वाज के प्रश्न संख्या 612 के लिखित उत्तर में बताया गया कि डीपीआर के लिए स्वीकृति दे गई है।
और यदि गेज परिवर्तन पर्यावरण की कीमत पर होना हो तो इस मार्ग को अपना समझ कर इसी में प्राण फूंके जाने चाहिएं। बैजनाथ पपरोला स्टेशन का सुंदरीकरण केंद्रीय योजना के अंतर्गत हुआ है लेकिन ट्रेन ही न चले तो यह वैसा ही है, जैसे किसी खंडहर को आबाद कर दो…, पहुंचना भूल जाओ। समझना होगा कि कांगड़ा घाटी रेलवे केवल एक रेल लाइन नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की पहचान, धरोहर और गौरव भी है। इसे पूरे भाव के साथ विकसित किया जाना चाहिए। और विश्व धरोहर के लिए यूनेस्को के संभावित स्थलों में इस रेलमार्ग के प्रविष्ट होने पर दृष्टि है तो भी धरोहर पर जमी धूल को तो झाड़ना ही पड़ेगा न।
कांगड़ा घाटी रेल संघर्ष समिति के अध्यक्ष पीसी विश्वकर्मा कहते हैं कि डलहौजी रोड रेलवे स्टेशन पर 21 करोड़ रुपये खर्च करने से बेहतर है कि पठानकोट शहर में अंडरपास या फ्लाईओवर बनाने पर खर्च किए जाएं, ताकि पठानकोट भी न ठिठके और हिमाचल की गाड़ी भी चलती रहे। वर्तमान में तो अग्रज शायर दुष्यंत कुमार से क्षमायाचना करते हुए यही कहा जा सकता है :
तुम कहां रेल सी गुजरती हो
मैं भी कब पुल सा थरथराता हूं

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

