श्री जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में चूहों और तिलचट्टों की दोबारा मौजूदगी सामने आने से सेवायतों की चिंता बढ़ गई है। भगवान के पवित्र शरीर को किसी तरह की क्षति न पहुंचे, इसे लेकर मंदिर प्रशासन ने समस्या के स्थायी समाधान पर मंथन शुरू कर दिया है।
बैठक के बाद पटाजोशी महापात्र ने बताया कि रात में जब भगवान विश्राम करते हैं, तब गर्भगृह और आसपास के क्षेत्र में अंधेरा रहता है। इसी दौरान चूहे और तिलचट्टे सक्रिय होकर मंदिर के भीतर घूमते हैं।
कई बार इन्हें कनक मुंडी चंदुआ तक पहुंचते हुए भी देखा गया है। उन्होंने कहा कि मंदिर की परंपरा और शास्त्रीय विधानों में इनसे निपटने के लिए विशेष उपाय निर्धारित हैं। चूहों को पकड़ने के लिए जाल लगाए जाते हैं, जबकि तिलचट्टों को आकर्षित कर नियंत्रित करने के लिए गुड़ से भरे पात्र रखने की परंपरा बताई गई है।
जय-विजय द्वार से गर्भगृह तक का क्षेत्र भगवान के विश्राम के दौरान रात में अंधकारमय रहता है। सेवायतों के अनुसार, यही स्थिति चूहों और अन्य कीटों को सक्रिय होने का अवसर देती है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि वे भगवान के वस्त्र, पूजा सामग्री अथवा पवित्र अंगों को नुकसान न पहुंचा दें। मंदिर प्रशासन अब परंपराओं और धार्मिक मर्यादाओं का पालन करते हुए प्रभावी उपाय तय करने की तैयारी में है। अंतिम निर्णय के लिए एसजेटीए के मुख्य प्रशासक की अध्यक्षता में जल्द ही एक और बैठक होने की संभावना है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

