किसी भी जगह के लोकगीत और लोक नृत्य वहां की संस्कृति को बयां करते हैं। इसी में ओडिशा का दालखाई लोकगीत भी शामिल है। खास बात ये है कि ये लोकगीत होने के साथ-साथ एक नृत्य भी है, जो पश्चिमी ओडिशा की पहचान है।
दालखाई का इतिहास
दालखाई संगीत और नृत्य का इतिहास पश्चिमी ओडिशा की आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति से जुड़ा है। इसे प्रकृति की पूजा से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत संबलपुर के जनजातीय समुदायों, जैसे- गोंड, मिर्धा आदि ने की थी। समय के साथ ये सिर्फ जनजातीय समुदाय तक सीमित नहीं रहकर पूरे ओडिशा की संस्कृति का प्रतीक बन गया।
प जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई? आइए जानें कैसे हुई दालखाई लोकगीत की शुरुआत और इसमें ऐसा क्या खास है, जो ये ओडिशा की संस्कृति में इतना महत्व रखता है।
दालखाई क्यों गाया जाता है?
दालखाई मुख्य रूप से भाई ज्यूतिंया त्योहार के अवसर पर गाया और नाचा जाता है। ये त्योहार दुर्गा पूजा के दौरान मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और अच्छी सेहत के लिए व्रत रखती हैं और मां दुर्गा की आराधना करती हैं। पूजा के बाद दालखाई गाते हुए नृत्य किया जाता है।
इन गीतों के जरिए मां दुर्गा और प्रकृति की पूजा की जाती है और आभार व्यक्त किया जाता है। दालखाई गीतों के जरिए भक्त अपनी भावनाओं को भगवान तक पहुंचाते हैं।
दालखाई लोकगीत की खासियत क्या है?
इन गीतों की सबसे बड़ी पहचान है कि हर पंक्ति के अंत में सहेली का नाम लेते हुए दालखाई रे शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। ये इस गीत को खास लय देता है, जिससे इस पर नृत्य करना और आसान हो जाता है। दूसरी बात है कि दालखाई गीतों को और मजेदार बनाने के लिए पारंपरिक बाजों का इस्तेमाल होता है। इसमें ढोलक, ताशा, मुहरी आदि शामिल होते हैं। ढोल की तेज थाप पर ये गीत गाए जाते हैं, जिनपर महिलाएं नृत्य भी करती हैं।
हालांकि, दालखाई गीत त्योहार पर गाए जाते हैं, लेकिन इन गीतों का विषय सिर्फ पूजा-पाठ नहीं होता। इन गीतों में राधा-कृष्ण के प्रेम, गांव के जीवन, प्रकृति की सुंदरता और हास्य का भी जिक्र मिलता है। साथ ही, दालखाई गाते और नाचते समय महिलाएं संबलपुरी साड़ी पहनती हैं, लाल रंग का रुमाल हाथों में बांधती हैं और पारंपरिक गहने पहनकर तैयार होती हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

