नीम करौली बाबा: संत जाते नहीं, दृश्य से अदृश्य हो जाते हैं…
संतों की महासमाधि विराम नहीं, विराट में विलय है। देह की सीमाओं से मुक्त होकर उस चेतना में समा जाने का क्षण, जहां से संत फिर किसी एक स्थान, एक काल या एक शरीर के नहीं रह जाते।
आज ही के दिन 11 सितंबर 1973 को वृंदावन की पावन धरा पर परम पूज्य नीम करौली बाबा जी ने अपनी नश्वर देह का परित्याग किया। पंचतत्व की देह शांत हुई, किंतु भक्ति का वह प्रकाश बुझा नहीं, असंख्य हृदयों में बिखर गया।
बाबा ब्रह्मलीन हुए, लेकिन भक्तों से दूर नहीं हुए।
शायद संतों का जाना ऐसा ही होता है… आंखों से ओझल होकर वे अंतर्मन में और अधिक दिखाई देने लगते हैं।
आज भी कैंची धाम की सीढ़ियों पर बैठा कोई भक्त आंखें बंद करता है तो बाबा पास लगते हैं। कोई संकट में उनका स्मरण करता है तो मन के किसी कोने में अचानक भरोसे का दीप जल उठता है
कोई हनुमान जी के सामने सिर झुकाता है तो बाबा की सहज साधना जैसे भीतर से पुकारती है कि प्रेम करो, सेवा करो और प्रभु का स्मरण रखो।
बाबा का जीवन किसी कठिन दर्शन की भारी पोथी नहीं था। वह तो भक्ति की बहती हुई सरल सरिता था।
एक कंबल।
एक सहज मुस्कान।
हनुमान जी में अटूट आस्था।
और जीव मात्र के लिए अथाह प्रेम।
न पांडित्य का प्रदर्शन।
न प्रसिद्धि की प्यास।
न स्वयं को सिद्ध करने की कोई आकांक्षा।
उनके पास लोग प्रश्न लेकर आते थे। कभी उत्तर एक दृष्टि में मिल जाता, कभी मुस्कान में, कभी प्रसाद में और कभी मौन में।
वह मौन भी कितना मुखर रहा होगा! क्योंकि संत कई बार हमारे प्रश्नों का उत्तर नहीं बदलते, प्रश्नों से व्याकुल हमारे मन को बदल देते हैं।
बाबा की साधना के केंद्र में श्री हनुमान जी थे। वही हनुमान, जिनमें अपार शक्ति है लेकिन अहंकार नहीं। अद्भुत सामर्थ्य है लेकिन स्वार्थ नहीं। प्रचंड पराक्रम है लेकिन प्रत्येक श्वास में प्रभु श्री राम हैं।
शायद बाबा ने भी उसी भक्ति को अपने जीवन में उतार लिया था… भक्ति में विनय, व्यवहार में वात्सल्य और जीवन में सेवा।
उनका जीवन जैसे चुपचाप कहता रहा कि भक्ति केवल मंदिर में दीप जलाना नहीं है,
किसी बुझते हुए मन में आशा का दीप जला देना भी भक्ति है।
संसार हमें बड़ा होना सिखाता है। संत हमें छोटा होना सिखाते हैं।
इतना छोटा कि अहंकार के लिए जगह न बचे। इतना सरल कि छल ठहर न सके। इतना निर्मल कि ईश्वर को भीतर आने के लिए द्वार खोजना न पड़े।
और शायद इसीलिए बाबा आज के समय में और अधिक प्रासंगिक लगते हैं।
हमारे साधन बढ़ गए, लेकिन शांति घटती जा रही है। संपर्क बढ़ गए, संबंध सिमटते जा रहे हैं। सूचनाओं का समुद्र हमारे सामने है, फिर भी भीतर कोई प्यास अधूरी है। दुनिया हथेली में समा गई है, मगर मन संभाले नहीं संभलता।
ऐसे समय में बाबा की सहज साधना जैसे कंधे पर हाथ रखकर कहती है…
थोड़ा प्रेम बढ़ाओ।
थोड़ी सेवा बढ़ाओ।
थोड़ा प्रभु-स्मरण बढ़ाओ।
जीवन का बोझ अपने आप हल्का होने लगेगा।
यही बाबा की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है। उनकी चेतना किसी समाधि, मंदिर या तीर्थ की सीमा में बंधी नहीं। वह कैंची की हवाओं में है, वृंदावन की रज में है, हनुमान मंदिर की घंटियों में है, भंडारे में परोसी जाती थाली में है, किसी भूखे को दिए निवाले में है और किसी दुखी के कंधे पर रखे सांत्वना के हाथ में है।
बाबा वहां हैं, जहां भक्ति में भाव है, सेवा में स्वार्थ नहीं और स्मरण में श्री राम हैं।
आज उनके महासमाधि दिवस पर मन करता है कि उनकी तस्वीर के सामने कुछ मांगा ही न जाए। बस कुछ देर बैठा जाए। अपनी सारी चिंताएं, इच्छाएं, शिकायतें और उलझनें उनके श्रीचरणों में रखकर इतना कहा जाए…
बाबा!
हमें चमत्कार नहीं, चरित्र दीजिए।
वैभव नहीं, विवेक दीजिए।
प्रसिद्धि नहीं, प्रेम दीजिए।
और इतनी भक्ति दीजिए कि सुख में आपको भूलें नहीं और दुःख में आपसे रूठें नहीं।
जीवन में इससे बड़ी संपदा और क्या होगी कि जब सारे सहारे छूटते दिखाई दें, तब हृदय के भीतर से विश्वास की एक आवाज उठे… चिंता कैसी? हनुमान जी हैं न!
11 सितंबर बाबा के ब्रह्मलीन होने का स्मरण कराता है, किंतु संतों का महासमाधि दिवस अनुपस्थिति का दिवस कहां होता है?
वह तो उनकी अनंत उपस्थिति को अनुभव करने का दिवस है।
उस दिन देह का दीप शांत हुआ था, लेकिन भक्ति का भोर हो गया। बाबा आंखों से ओझल हुए, हृदय से नहीं।
और इसीलिए नीम करौली बाबा जी असंख्य हृदयों में चलती हुई प्रार्थना, धड़कता हुआ विश्वास और हनुमान भक्ति की अखंड ज्योति हैं।
परम पूज्य नीम करौली बाबा जी के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन।
जय गुरुदेव!
जय श्री राम!
जय बजरंगबली!

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

