अंतरिम भरण-पोषण से जुड़े मामले में अहम आदेश पारित करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि हिंदू मैरिज एक्ट की धारा- 24 के तहत नौकरी करने और पैसे कमाने की अवधि के लिए पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की हकदार नहीं है।
उक्त टिप्पणी और आदेश देते हुए पीठ ने पारिवारिक कोर्ट के उस आदेश में बदलाव कर दिया, जिसमे पति को भरण-पोषण की अर्जी दाखिल करने की तारीख से पत्नी को पांच हजार रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया गया था।
पारिवारिक कोर्ट के आदेश को पति ने चुनौती दी
पारिवारिक कोर्ट के आदेश को पति ने चुनौती दी थी। आठ जनवरी, 2021 से तलाक की अर्जी के निपटारे तक पारिवारिक कोर्ट ने पांच हजार रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। दोनों की शादी 25 अक्टूबर 2015 को हुई थी। वे नवंबर 2020 से अलग-अलग रहने लगे और बाद में पत्नी ने क्रूरता के आधार पर तलाक की कार्यवाही शुरू की और हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण की भी मांग की।
बाटा शोरूम में सेल्स हेल्पर के तौर पर काम किया
हाई कोर्ट के सामने पति ने तर्क दिया कि पत्नी आर्थिक रूप से स्थिर थी और उसने अपनी दलीलों में स्वीकार किया था कि वह बाटा शोरूम में काम कर रही थी। पत्नी के भरण-पोषण पाने के अधिकार पर कोर्ट ने गौर किया कि उसने पारिवारिक कोर्ट में दिए गए अपने हलफनामे में महिला ने यह भी बताया कि उसने शनिवार और रविवार को बाटा शोरूम में सात हजार रुपये प्रति महीने पर सेल्स हेल्पर के तौर पर काम किया था।
जून 2024 में उन्हें नौकरी से हटा दिया गया क्योंकि मालिक को अब और स्टाफ की जरूरत नहीं थी। सभी तथ्यों को देखते हुए पीठ ने कहा कि आठ जनवरी 2021 से जून 2024 तक की अवधि के लिए महिला अंतरिम भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

