पवित्र नगरी सुल्तानपुर लोधी से ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री बेर साहिब से श्री गुरु नानक देव जी का बारात रूपी विशाल नगर कीर्तन बटाला के लिए रवाना हो गया है। देश विदेश से संगत गुरुद्वारा साहिब में नतमस्तक हुई और नगर कीर्तन में शामिल हुई है।
कीर्तन पर फूलों से वर्षा करते हुए श्रद्धालु।
हर किलोमीटर पर सेवा, हर दिल में श्रद्धा
इस बार नगर कीर्तन के रास्ते में सेवा की एक अनूठी मिसाल देखने को मिलेगी। पूरे 100 किलोमीटर के मार्ग पर हर एक किलोमीटर पर संगत के लिए लंगर, छबील और चाय-पानी की सेवा का प्रबंध किया गया है।
नगर कीर्तन के स्वागत के लिए सुल्तानपुर लोधी में खालसा मार्बल की ओर से चाय-पकौड़ों का अटूट लंगर, तलवंडी चौधरियां में जोगा सिंह कालेवाल, मंगूपुर व मुंडी मोड़ पर ग्राम पंचायतों द्वारा मुख्य लंगर लगाया गया।
उच्चा बेट में गुरुद्वारा लंगर साहिब में संत बाबा लीडर सिंह, खैड़ा बेट में संत बाबा महात्मा मुनि और संत बाबा अमरीक सिंह तथा ठट्टा टिब्बा में संत बाबा हरजीत सिंह जी द्वारा फूलों की वर्षा कर भव्य स्वागत किया जाएगा। एसजीपीसी मैनेजर अवतार सिंह और हेड ग्रंथी भाई हरजिंदर सिंह की देखरेख में पूरी टीम दिन-रात व्यवस्थाओं में जुटी है।
नगर कीर्तन में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़।
सैंकड़ों सालों से चली आ रही परंपरा
सुल्तानपुर लोधी की धरती पर सैकड़ों साल पुरानी परम्परा के मुताबिक श्री गुरु नानक देव जी के विवाह उत्सव को आज भी उतनी ही श्रद्धा और उल्लास से मनाया जा रहा है, जिसे संगत बाबे दा ब्याह और बाबे दा मेला के नाम से याद करती है। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो सन 1487 का वह दिन आज भी लोगों की जुबान पर है।
बटाला के निवासी मूलचंद पटवारी की सुपुत्री बीबी सुलक्खणी जी के साथ श्री गुरु नानक देव जी का पावन विवाह सम्पन्न हुआ था। बताया जाता है कि गुरु जी की बरात सुल्तानपुर लोधी से चलकर बाबा बकाला साहिब होते हुए बटाला पहुंची थी। उस बारात में आम से लेकर खास तक सभी शामिल थे।
सुल्तानपुर लोधी के नवाब दौलत खां लोधी और राय भोए की तलवंडी के राय बुलार भट्टी जैसे गणमान्य लोग भी बरात का हिस्सा बने थे। बटाला पहुंचने पर अजिता रंधावा सहित शहर के प्रमुख लोगों ने बरात का भव्य स्वागत किया था।
वे कच्ची दीवार आज भी खड़ी है
गुरु जी की बरात जहां ठहरी थी, वह स्थान आज गुरुद्वारा श्री कंध साहिब के रूप में प्रसिद्ध है और जहां आनंद कारज की रस्म हुई, वह स्थान गुरुद्वारा श्री डेहरा साहिब के नाम से जाना जाता है। गुरुद्वारा कंध साहिब से एक चमत्कारी साखी भी जुड़ी है। कहा जाता है कि जब बरात वहां पहुंची तो तेज बारिश हो रही थी। गुरु जी को एक कच्ची दीवार के सहारे बैठाया गया।
तभी एक बुजुर्ग माता ने उन्हें कहा कि यह कंध कच्ची है, कभी भी गिर सकती है, आप यहां से हट जाइए। इस पर गुरु नानक देव जी ने मुस्कुराते हुए कहा था कि माता, यह कंध युगों-युगों तक कायम रहेगी। मान्यता है कि वह कच्ची दीवार आज भी गुरुद्वारा साहिब में शीशे के फ्रेम में जस की तस सुरक्षित है।
नगर कीर्तन के लिए रवाना होते हुए सगत व श्री गुरु ग्रंथ साहिब को पाली साहिब की तरफ लेकर जाते हुए एसजीपीसी प्रधान हरजिंदर सिंह धामी।
महाराजा नौनिहाल सिंह ने करवाया निर्माण
इस ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब का निर्माण बाद में महाराजा नौनिहाल सिंह ने करवाया था, जिसका प्रबंधन अब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी देख रही है। इस पावन मौके पर देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु सुल्तानपुर लोधी पहुंचे हैं। नगर कीर्तन का रास्ते में जगह-जगह धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों द्वारा फूलों की वर्षा कर स्वागत किया जाएगा।
गौरतलब है कि गुरु जी अपनी बड़ी बहन बेबे नानकी जी के पास सुल्तानपुर लोधी आकर रहने लगे थे। उनके जीजा जयराम जी ने उन्हें नवाब दौलत खां लोधी के मोदीखाने में कार्य पर लगवाया था। इसी दौरान उनकी सगाई और फिर 1487 में विवाह हुआ, जिसकी परम्परा आज भी जीवंत है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

