भोजपुर के रितेश की कहानी: पिता का साया छूटा, नौकरी अटकी, कानूनी लड़ाई लड़ी और आखिरकार बन गए सहायक कमांडेंट

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विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए सफलता हासिल करने वाले शाहपुर क्षेत्र के लिलारी गांव निवासी रितेश कुमार ओझा की कहानी युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।

वर्ष 2019 में यूपीएससी सीएपीएफ की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद एक अधिकारी की गलती के कारण उन्हें करीब छह वर्षों तक नियुक्ति के लिए इंतजार करना पड़ा।

इस दौरान उन्होंने हार नहीं मानी और अपने अधिकार के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया। अब रितेश सहायक कमांडेंट बनने जा रहे हैं।

रितेश के जीवन में संघर्ष की शुरुआत काफी पहले हो गई थी। उनके पिता स्व. कामेश्वर ओझा का निधन उस समय हो गया था, जब रितेश काफी छोटे थे।

पिता के निधन के बाद परिवार के सामने आर्थिक परेशानियां खड़ी हो गईं। उनकी मां विमला देवी ने विपरीत परिस्थितियों में परिवार को संभाला और बच्चों की पढ़ाई जारी रखी।

मुश्किलों के बीच नहीं छोड़ी पढ़ाई

परिवार की आर्थिक स्थिति और पिता की कमी के बावजूद रितेश ने पढ़ाई के प्रति अपनी लगन कम नहीं होने दी। उन्होंने दसवीं की शिक्षा क्राइस्ट कॉन्वेंट स्कूल, दिलदारनगर से पूरी की।

इसके बाद एयर फोर्स स्कूल, ग्वालियर से 12वीं की पढ़ाई की। आगे उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा हासिल की।

पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। लगातार मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वर्ष 2019 में उन्होंने यूपीएससी सीएपीएफ परीक्षा उत्तीर्ण की।

परीक्षा में सफलता मिलने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि जल्द ही सरकारी सेवा में जाने का सपना पूरा होगा, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया में आई अड़चन ने उनकी राह मुश्किल कर दी।

अधिकारी की गलती से अटकी नियुक्ति

परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एक अधिकारी की गलती के कारण नियुक्ति प्रक्रिया में समस्या उत्पन्न हो गई। इसके चलते रितेश को नौकरी से वंचित रहना पड़ा।

एक ओर परीक्षा पास करने के बावजूद नियुक्ति नहीं मिल रही थी, वहीं दूसरी ओर उन्हें अपने अधिकार के लिए कानूनी रास्ता अपनाना पड़ा।

इसके बाद शुरू हुई छह वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई। कई वर्षों तक उन्होंने न्याय पाने के लिए संघर्ष किया। लंबे इंतजार के दौरान भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और अपने हक की लड़ाई जारी रखी।

चाचा और चचेरे भाई ने दिया साथ

रितेश के संघर्ष में उनके चाचा देवाकांत ओझा और चचेरे भाई राजेश ओझा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों ने कानूनी प्रक्रिया में उनका साथ दिया।

मुश्किल दौर में लगातार उनका हौसला बढ़ाते रहे। परिवार के सहयोग और रितेश की दृढ़ इच्छाशक्ति ने उन्हें संघर्ष जारी रखने की ताकत दी।

छह साल बाद मिली जीत

लंबे इंतजार और कानूनी संघर्ष के बाद आखिरकार रितेश को न्याय मिला। उनकी नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया और सहायक कमांडेंट बनने का उनका सपना पूरा होने जा रहा है। छह वर्षों तक नौकरी के इंतजार के बाद मिली इस सफलता से परिवार और गांव में खुशी का माहौल है।

रितेश की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करने के बावजूद किसी कारण से अपने लक्ष्य से दूर हो जाते हैं।

उनका संघर्ष यह संदेश देता है कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों, दृढ़ इच्छाशक्ति, धैर्य और निरंतर प्रयास से मंजिल हासिल की जा सकती है।

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