साम-दाम-दंड-भेद… मिडिल ईस्ट में हथियार बेचने के लिए हर तरकीब अपना रहा चीन, पाकिस्तान को बनाया मोहरा

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 मिडिल ईस्ट में अमेरिका-ईरान के बीच हुए युद्ध का असर सबसे ज्यादा खाड़ी देशों पर पड़ा। युद्ध में शामिल न होते हुए भी वे इस जंग का हिस्सा बन गए।

मिडिल ईस्ट में अब सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो रहा है और इसे अंजाम दे रहा है चीन। लेकिन चीन अपने काम को खुद न करते हुए पाकिस्तान से ये काम करवा रहा है।

पाकिस्तान को मोहरा बनाकर हथियार बेच रहा चीन

पाकिस्तान के मिडिल ईस्ट के देशों से बेहतर संबंध है और इसी बात का फायदा चीन उठा रहा है। चीन, पाकिस्तान को मोहरा बनाकर मिडिल ईस्ट देशों को हथियार सप्लाई कर रहा है।

सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक रक्षा समझौते हुआ, जिसमें एक पर हमले को दोनों पर हमला माना जाता है। इस समझौते के बाद पाकिस्तान ने तुरंत सऊदी अरब में JF-17 फाइटर जेट, सैनिक और रक्षा उपकरण तैनात किए।

US-Iran मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग के कारण हुई यह तैनाती सिर्फ पाकिस्तान के समर्थन का दिखावा नहीं थी। यह अरब की जमीन पर चीनी सैन्य उपकरणों का फायर प्रदर्शन था।

देखा जाए तो पाकिस्तान मिडिल ईस्ट में सैन्य विस्तार के लिए चीन का मुख्य जरिया बन गया है। सीधे हथियार बेचने के बजाय, बीजिंग इस्लामाबाद का इस्तेमाल प्रमोटर के तौर पर कर रहा है।

पाकिस्तान ने कई देशों को कर रहा हथियार सप्लाई

चीन सक्रिय रूप से पाकिस्तान का इस्तेमाल JF-17 फाइटर जेट, HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम और आर्म्ड ड्रोन (हथियारबंद ड्रोन) के सौदे करवाने के लिए कर रहा है।

पाकिस्तान के ये सौदे कई देशों के साथ हो रहे हैं, जिनमें इराक, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, नाइजीरिया, मोरक्को, लीबिया, बांग्लादेश, सूडान और इथियोपिया शामिल हैं।

पाकिस्तान इन सौदों में अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाता है और चीन को भू-राजनीतिक तनाव से बचाता है। इसका एक बड़ा उदाहरण हाल ही में पाकिस्तान और लीबिया के बीच हुआ रक्षा समझौता है।

पाकिस्तान ने इस रक्षा सौदे में लीबियाई नेशनल आर्मी को 16 JF-17 और ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट सप्लाई किए। इस व्यवस्था ने चीन को लीबिया में सैन्य संतुलन को तेजी से बदलने और अपनी पैठ बढ़ाने का मौका दे दिया जबकि पाकिस्तान ने संभावित अंतरराष्ट्रीय विरोध का सामना किया।

सऊदी अरब को चीन के हथियारों को शक

चीन की पाकिस्तान के जरिए हर डील सफल नहीं हुई। पाकिस्तान को सऊदी अरब को JF-17 विमान देने थे, जिसके बदले में इस्लामाबाद को वित्तीय मदद मिलनी थी, जो कि 2 अरब डॉलर का लोन हो सकती थी, लेकिन यह डील पूरी नहीं हुई।

सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ इस डील को इसलिए कैंसिल किया, क्योंकि उसे चीनी हथियारों की क्वालिटी को लेकर चिंता थी। इसके अलावा अमेरिका के साथ तालमेल और वित्तीय पहलू भी इस डील के कैंसिल होने का कारण रहे।

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