हिमाचल में लोग पहले की तुलना में अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता के चलते प्रदेश में जन्म के समय औसत जीवन बढ़कर 74.1 वर्ष तक पहुंच गया है। पहले औसत जीवन 68 वर्ष था। हालांकि इसके साथ एक चिंताजनक तस्वीर भी सामने आई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में हर एक हजार जन्म पर 14 शिशुओं की एक वर्ष से पहले ही मौत हो जाती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश की शिशु मृत्यु दर (आइएमआर) एक हजार जन्म पर 14 दर्ज की गई है। वहीं नवजात मृत्यु दर (एनएमआर) एक हजार पर 10 और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 17 प्रति हजार है।
आखिर क्या है वजह
नवजात और शिशु मौतों के पीछे समय से पहले जन्म, कम वजन वाले बच्चों का जन्म, गर्भावस्था के दौरान होने वाली जटिलताएं तथा समय पर उपचार नहीं मिल पाना प्रमुख कारण हैं। जनजातीय और दूरदराज क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की चुनौतियों के कारण यह समस्या अपेक्षाकृत अधिक गंभीर बनी हुई है।
बुजुर्गों को स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार का लाभ
दूसरी ओर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार का सकारात्मक असर लोगों की आयु पर साफ दिखाई दे रहा है। बेहतर टीकाकरण व्यवस्था, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तथा संक्रामक रोगों पर नियंत्रण के कारण जीवन प्रत्याशा में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
क्या कहना है स्वास्थ्य विभाग का
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों को और अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है। उच्च जोखिम वाली गर्भवतियों की विशेष निगरानी, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाइयों (एसएनसीयू) को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है। हिमाचल ने स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन नवजात व शिशु मृत्यु दर में और कमी लाने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच दोनों पर समान रूप से काम करने की जरूरत है। खासकर दुर्गम क्षेत्रों में समय पर विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती होगी।


