सिंगरौली। नगर पालिका निगम सिंगरौली एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। इस बार मामला करीब 5 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित दो तालाबों के गहरीकरण, सीढ़ी निर्माण और रेलिंग कार्य के टेंडर से जुड़ा हुआ है। कई संविदाकारों ने निगम के एक जिम्मेदार अधिकारी पर टेंडर प्रक्रिया में कथित रूप से मनमाने बदलाव कर अपने चहेते ठेकेदार को लाभ पहुंचाने का गंभीर आरोप लगाया है। मामले को लेकर नाराज संविदाकार अब न्यायालय की शरण लेने की तैयारी कर रहे हैं।

हरिहर रोड और गायत्री तालाब के कार्य का था टेंडर
जानकारी के अनुसार नगर पालिका निगम सिंगरौली द्वारा हरिहर रोड एवं हरई वार्ड क्रमांक-31 स्थित गायत्री तालाब के गहरीकरण, सीढ़ी निर्माण तथा रेलिंग निर्माण कार्य के लिए निविदा जारी की गई थी। इस कार्य का अनुमानित मूल्य लगभग 4 करोड़ 99 लाख रुपये बताया जा रहा है। टेंडर प्रक्रिया में जिले सहित बाहर की कई निर्माण कंपनियों एवं संविदाकारों ने भाग लिया था। लेकिन बाद में टेंडर की पात्रता शर्तों को लेकर विवाद खड़ा हो गया।

नियम बदलकर ठेकेदारों को किया गया अपात्र?
संविदाकारों का आरोप है कि निगम के एक अधिकारी द्वारा निविदा में भाग लेने वाले अधिकांश ठेकेदारों को अपात्र घोषित करने के उद्देश्य से टेंडर की मूल शर्तों में बदलाव किया गया। आरोपों के अनुसार सामान्यतः इस प्रकार के कार्यों में भाग लेने के लिए संविदाकार का पिछले तीन वित्तीय वर्षों का टर्नओवर टेंडर की अनुमानित लागत का लगभग 20 से 30 प्रतिशत होना चाहिए। इस हिसाब से लगभग 5 करोड़ रुपये के कार्य के लिए एक से डेढ़ करोड़ रुपये के वार्षिक औसत टर्नओवर वाले संविदाकार भी पात्र माने जा सकते थे।

लेकिन आरोप है कि टेंडर की शर्त क्रमांक-8 में संशोधन करते हुए यह प्रावधान जोड़ दिया गया कि निविदा में भाग लेने वाले संविदाकार का पिछले तीन वित्तीय वर्षों का टर्नओवर 20 करोड़ रुपये से कम नहीं होना चाहिए। संविदाकारों का दावा है कि इस शर्त के कारण अधिकांश स्थानीय एवं पात्र ठेकेदार स्वतः ही प्रक्रिया से बाहर हो गए।

अधिकारी पर पद के दुरुपयोग का आरोप
नाराज संविदाकारों का आरोप है कि नगर निगम के अधिकारी संतोष पांडेय ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निविदा शर्तों में बदलाव किया और इससे एक विशेष संविदाकार कंपनी को सीधा लाभ मिला। उनका कहना है कि इस प्रकार का संशोधन सक्षम स्तर की स्वीकृति के बिना नहीं किया जा सकता था। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित अधिकारी का पक्ष अभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
शिकायत के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई
संविदाकारों का दावा है कि पूरे मामले की शिकायत नगर निगम आयुक्त से भी की गई थी, लेकिन शिकायत के बावजूद निविदा प्रक्रिया को नहीं रोका गया और अंततः कार्य आवंटित कर दिया गया। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया को “मैनेज” करते हुए चहेते ठेकेदार को कार्य सौंपा गया।
मामले में एक और बड़ा आरोप यह लगाया जा रहा है कि नगर निगम में सामान्यतः अधिकांश कार्य अनुमानित लागत से 20 से 30 प्रतिशत तक कम दर (Below Estimate) पर मिल पाए हैं क्यों कि इतने संविदाकार टेंडर प्रक्रिया में भाग लेते हैं कि कमिटीशन की वजह से एस्टीमेट मूल्य से टेंडर 20 से 30 प्रतिशत बिलों चला जाता है कभी कभी ये 50 प्रतिशत से अधिक बिलों भी चल जाता है ऐसे में निगम को वित्तीय बचत होती है। लेकिन संबंधित तालाब निर्माण कार्य में सभी भाग लेने वाले संविदाकारों को अपात्र घोषित करके कथित रूप से मात्र 3 प्रतिशत बिलों दर पर ठेका स्वीकृत किया गया, जबकि 18 प्रतिशत जीएसटी अलग से जोड़ा गया। संविदाकारों का आरोप है कि इससे निगम को संभावित आर्थिक नुकसान हुआ है।और संबंधित अधिकारी को निजी फायदा?

हाईकोर्ट जाने की तैयारी
मामले से नाराज कई संविदाकार अब उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए तो टेंडर प्रक्रिया में किए गए कथित बदलावों और पात्रता शर्तों में संशोधन की पूरी सच्चाई सामने आ सकती है।अब देखना होगा कि नगर निगम प्रशासन इन आरोपों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या शासन स्तर पर इस पूरे मामले की जांच कराई जाती है या नहीं।
शेष अगले अंक में…


