NCPI में शामिल हुए TMC के 20 सांसदों ने चली चाल, काकोली घोष को बनाया पार्टी अध्यक्ष

पश्चिम बंगाल की राजनीति और देश की संसद से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर आ रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों ने दलबदल विरोधी कानून के तहत अपनी सांसदी गंवाने से बचने के लिए एक अनोखा और बड़ा रास्ता निकाला है। इन बागी सांसदों ने एक छोटी और गुमनाम सी राजनीतिक पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) का न सिर्फ दामन थाम लिया है, बल्कि पूरी पार्टी पर ही कब्जा कर लिया है।

इतना ही नहीं ममता बनर्जी की पुरानी और बेहद करीबी रहीं काकोली घोष दस्तीदार को इस नई पार्टी (NCPI) का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया है। बता दें कि काकोली घोष ही लोकसभा में ममता बनर्जी के खिलाफ हुए इस विद्रोह का मुख्य चेहरा हैं।

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रातों-रात कैसे चमकी एक गुमनाम पार्टी की किस्मत?

देखा जाए तो पश्चिम बंगाल की राजनीति का इस नए अध्याय का पूरा खेल बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत खेला गया है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि सीक्रेट डील के तहत 30 मई को काकोली घोष दस्तीदार को NCPI का अध्यक्ष चुना गया।

इससे ठीक दो दिन पहले, पार्टी की पुरानी अध्यक्ष शेवली कुंडू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। यह सब आपसी सहमति से इस छोटी पार्टी को बागियों के हवाले करने के लिए किया गया।

20 सांसदों का समर्थन

इससे पहले टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी सांसद रविवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिले। उन्होंने स्पीकर को जानकारी दी कि उनके पास दो-तिहाई से ज्यादा सांसदों का बहुमत है, इसलिए वे टीएमसी छोड़कर NCPI में शामिल हो रहे हैं, ताकि उनकी सदस्यता रद्द न हो।

पर्दे के पीछे से BJP का पूरा साथ!

देखा जाए तो भाजपा ने अभी तक इस पूरे मामले में कोई कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक इस पूरी रणनीति के पीछे भाजपा का ही हाथ है। ऐसा अनुमान इसलिए लगाया जा रहा है, क्योंकि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और वरिष्ठ सांसद निशिकांत दुबे लगातार इन बागी सांसदों के संपर्क में थे।

इसके अलावा गौर करने वाली बात यह भी है कि सभी बागी सांसदों की कई महत्वपूर्ण बैठकें केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर ही हुईं। फिर बीते रविवार को इन 20 सांसदों ने स्पीकर को साफ कर दिया कि वे NCPI में शामिल होकर भाजपा के नेतृत्व वाले NDA का हिस्सा बनने जा रहे हैं और उन्होंने सत्ताधारी गठबंधन की तरफ सीटें आवंटित करने की मांग की है।

आखिर ममता बनर्जी के भतीजे से क्यों है नाराजगी?

इस बात को ऐसे समझिए कि टीएमसी के सबसे सीनियर सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय (6 बार के सांसद) भी पिछले दिनों इस बागी गुट में शामिल हो गए। इन सभी सांसदों के गुस्से की मुख्य वजह ममता बनर्जी के भतीजे और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी हैं। सांसदों का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी बेहद घमंडी हैं और वे पार्टी के सीनियर नेताओं को दरकिनार कर अपनी मनमानी चला रहे हैं।

चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में क्या है NCPI?

गौरतलब है कि जिस NCPI पार्टी की किस्मत रातों-रात चमक गई है, उसका इतिहास ज्यादा बड़ा नहीं है या फिर यूं कहे कि बेहद मामूली है। NCPI का रजिस्ट्रेशन जनवरी 2023 में हुआ था और इसका पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल की एक बिल्डिंग का है।

इसके बाद 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने 4 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को सिर्फ 536 वोट मिले थे। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में यह देश की उन 2000 से ज्यादा पार्टियों में शामिल है जिन्हें मान्यता नहीं मिली हुई है।

NCPI नए उदय की ओर

ऐसे में अगर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला इस विलय को मंजूरी दे देते हैं, तो यह गुमनाम पार्टी रातों-रात लोकसभा की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी और एनडीए में भाजपा के बाद दूसरा सबसे बड़ा दल बन जाएगी। जिस पार्टी का आज तक कोई विधायक या सांसद नहीं था, वह सीधे देश की सत्ता का हिस्सा बनने जा रही है।

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