जसपाल राणा: जिस मंच तक गुरु नहीं पहुंचे, वहां शिष्या ने बुलंद किया तिरंगा; ओलिंपिक में जीते दो पदक

भारतीय निशानेबाजी के महानायक जसपाल राणा भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत हमेशा भारतीय खेल जगत को प्रेरित करती रहेगी।

राणा ने अपने करियर में एशियाई खेलों, कामनवेल्थ और विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन किया, लेकिन एक सपना अधूरा रह गया था, ओलिंपिक में खेलने का।

विडंबना यह रही कि जिस स्टैंडर्ड पिस्टल और सेंटर-फायर पिस्टल स्पर्धा में वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ निशानेबाजों में गिने जाते थे, वह ओलिंपिक का हिस्सा ही नहीं थीं। इसलिए उनके जैसा महान निशानेबाज भी ओलिंपिक मंच तक नहीं पहुंच सका। लेकिन नियति ने उनके लिए एक दूसरा रास्ता चुना।

जिस सपने को वह खिलाड़ी के रूप में पूरा नहीं कर पाए, उसे उन्होंने कोच बनकर साकार कर दिखाया। राणा की शिष्या और भारत की स्टार निशानेबाज मनु भाकर ने पेरिस ओलिंपिक में दो कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। मनु की इस सफलता के पीछे जसपाल राणा की कोचिंग, मार्गदर्शन और वर्षों की मेहनत की बड़ी भूमिका रही।

मनु के ओलिंपिक पोडियम पर पहुंचने के साथ ही राणा का वह सपना भी पूरा हुआ, जो कभी उनके अपने हाथों से छूट गया था। जसपाल राणा के निधन से भारतीय खेल जगत ने एक महान निशानेबाज को खो दिया है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद उनके पदक नहीं, बल्कि वह पीढ़ी है जिसे उन्होंने तराशा। मनु भाकर की ओलिंपिक सफलता उसी विरासत का सबसे चमकदार अध्याय है।

निशानेबाजी को दी थी नई पहचान

जसपाल राणा ने 1990 के दशक में भारतीय निशानेबाजी को नई पहचान दी थी। 1995 में इटली के मिलान में आयोजित कामनवेल्थ शूटिंग चैंपियनशिप में उन्होंने आठ स्वर्ण पदक जीतकर सनसनी मचा दी थी। इसके बाद उन्हें देशभर में ‘गोल्डन बाय’ के नाम से जाना जाने लगा। उनके नाम एशियाई खेलों व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के अनेक रिकार्ड दर्ज हैं।

हर खिलाड़ी में देखते थे देश का भविष्य

कोच बनने के बाद भी उनका मिशन नहीं बदला। वह हर खिलाड़ी में भारत का भविष्य देखते थे। उनके लिए प्रशिक्षण केवल तकनीक सिखाने तक सीमित नहीं था, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन और जीत का जज्बा पैदा करना भी था। यही वजह रही कि उनके मार्गदर्शन में तैयार कई निशानेबाज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

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