इसी तरह पिपरौली ब्लाक के एक गांव में प्रधान पद की तैयारी कर रहे एक दावेदार ने आरोप लगाया कि उनके परिवार के तीन सदस्यों के नाम सूची से गायब हैं, जबकि कुछ ऐसे नाम दर्ज हैं तो गांव के हैं ही नहीं । उधर खजनी क्षेत्र के एक संभावित प्रत्याशी ने दावा किया कि उनके समर्थक वर्ग से जुड़े कई मतदाताओं के नाम हट गए हैं, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। इन शिकायतों ने गांवों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

राजनीतिक गतिविधियों के बीच प्रत्याशी अब केवल प्रचार की रणनीति नहीं बना रहे, बल्कि मतदाता सूची को आधार बनाकर अपने वास्तविक वोट बैंक का आकलन भी कर रहे हैं। नए मतदाताओं की संख्या और हटाए गए नामों का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश की जा रही है कि किस वार्ड और किस समुदाय में वोटों का संतुलन बदला है।

इस बार की सूची इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि व्यापक पुनरीक्षण अभियान के बाद जिले में कुल 29 लाख 63 हजार 142 मतदाता दर्ज किए गए हैं। पुनरीक्षण के दौरान 5 लाख 64 हजार 149 नाम हटाए गए, जबकि 6 लाख 3 हजार नए मतदाता जोड़े गए हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, जिन्होंने एक जनवरी 2026 तक 18 वर्ष की आयु पूरी कर ली है। नए मतदाताओं के जुड़ने से कई ग्राम पंचायतों में चुनावी तस्वीर बदलने की संभावना जताई जा रही है।

राज्य निर्वाचन आयोग ने डुप्लीकेट और अपात्र मतदाताओं की पहचान के लिए विशेष साफ्टवेयर का उपयोग किया था। दो चरणों में हुए सत्यापन के बाद बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। हालांकि अब सूची जारी होने के बाद कई लोग इसे लेकर आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पंचायत चुनाव में जातीय और सामाजिक समीकरण जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उतनी ही अहम मतदाता सूची की शुद्धता भी होती है। यही कारण है कि अंतिम सूची के प्रकाशन के साथ ही गांवों में चुनावी गतिविधियां तेज हो गई हैं।