क्वाड, ऑयल और डिफेंस… अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत दौरा शुरू, किन मुद्दों पर रहेगी नजर?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो शनिवार को भारत की चार-दिनों यात्रा पर कोलकाता पहुंचे हैं। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब वैश्विक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और वॉशिंगटन-नई दिल्ली, दोनों ही अपनी प्रमुख रणनीतिक प्राथमिकताओं को फिर से निर्धारित करने का प्रयास कर रहे हैं।

ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा सहयोग से लेकर व्यापार और महत्वपूर्ण तकनीकों तक रूबियो की भारत यात्रा में भारत-अमेरिका संबंधों के लगभग हर मुद्दे को शामिल किए जाने की उम्मीद है। इसका समय भी काफी महत्वपूर्ण है। उनकी यह यात्रा क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक के साथ ही हो रही है।

क्वाड बैठक

रूबियो ठीक उसी समय पहुंचे, जब क्वाड यानी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आपसी तालमेल को मजबूत करने के उद्देश्य से बातचीत के लिए इकट्ठा हुए।

हाल के वर्षों में यह समूह भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण होता गया है। खासतौर से रक्षा सहयोग, उभरती प्रौद्योगिकियों और आपूर्ति-श्रृंखला की मजबूती से जुड़े मुद्दों पर। क्वाड को एक ऐसे मंच के रूप में भी देखा जाता है, जिसके जरिए इस क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव के बीच ये चारों लोकतांत्रिक देश आपस में और अधिक निकटता से समन्वय कर सकते हैं।

ऊर्जा सुरक्षा केंद्र-बिंदु बनी

इस दौरे के दौरान ऊर्जा सबसे बड़े चर्चा के विषयों में से एक होने की उम्मीद है। भारत लगातार बड़ी मात्रा में रियायती रूसी तेल खरीद रहा है, लेकिन अमेरिका एलएनजी और कच्चे तेल के निर्यात के जरिए भारत के ऊर्जा बाजार में अपनी पैठ बढ़ाना चाहता है।

मिडिल-ईस्ट में जारी अस्थिरता के कारण वैश्विक ऊर्जा प्रवाह पर लगातार पड़ रहे असर को देखते हुए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना नई दिल्ली के लिए एक बेहद जरूरी हो गया है।

व्यापारिक टकराव दूर करने की पहल

यह दौरा भारत-अमेरिका के आर्थिक संबंधों में एक मुश्किल दौर के बाद हो रहा है, जिसमें टैरिफ विवाद और प्रतिबंधों को लेकर टकराव देखने को मिला था। दोनों पक्षों के अधिकारियों से उम्मीद है कि वे इस यात्रा का उपयोग अंतरिम समझौतों को आगे बढ़ाने और व्यापक व्यापार तथा निवेश सौदों के लिए गति पैदा करने के लिए करेंगे।

चर्चाओं में महत्वपूर्ण खनिजों का मुद्दा प्रमुखता से उठने की संभावना है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि दोनों देश सेमीकंडक्टर और बैटरियों से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं।

रक्षा साझेदारी का विस्तार

रूबियो के कार्यक्रमों के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों के प्रमुखता से उभरने की उम्मीद है। वॉशिंगटन के साथ भारत की सैन्य साझेदारी पहले से ही उसके कई प्रमुख प्लेटफॉर्म और प्रणालियों का आधार है, जिनमें बोइंग P-8 पोसाइडन विमान, MQ-9B स्काईगार्डियन ड्रोन, M777 होवित्जर तोपें और बोइंग C-17 ग्लोबमास्टर III परिवहन विमान बेड़ा शामिल हैं। इनका भारतीय वायु सेना द्वारा बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।

लेकिन अब चर्चाएं सिर्फ खरीद-फरोख्त से आगे बढ़ रही हैं। रक्षा प्रणालियों का सह-उत्पादन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर तथा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग एजेंडा का एक अहम हिस्सा होने की उम्मीद है।

राजनीतिक दृष्टि से रूबियो की यात्रा का महत्व

रूबियो की यात्रा राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत और चीन के संबंध में उनका रुख लंबे समय से एक जैसा रहा है। वॉशिंगटन में भारत के समर्थक और चीन के प्रति संशय रखने वाले के तौर पर देखे जाने वाले रूबियो को एक सामान्य राजनयिक दूत से कहीं बढ़कर माना जाता है।

उनकी इस यात्रा को एक संकेत के तौर पर देखा जा सकता है कि पाकिस्तान के साथ हालिया अमेरिकी जुड़ाव के बावजूद ट्रंप प्रशासन इस क्षेत्र में भारत को ही अपना सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार मानता है।

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