मां बच्चों का जीवन सफल बनाने के लिए स्वयं का जीवन समर्पित कर देती है। हायाघाट प्रखंड के मझौलिया पंचायत की होरलपट्टी गांव की कंचन देवी उन्हीं मांओं में से एक हैं। इन्होंने मेहनत-मजदूरी कर न सिर्फ अपनी बेटी को पढ़ाया, बल्कि उसे अंचलाधिकारी के पद तक पहुंचाया।
जीविका संगठन से जुड़ी मंगनू सहनी की पत्नी कंचन देवी बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थी। घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। ऐसे में बच्चों को पढ़ाने का संकल्प इनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण था, लेकिन एक मां का हौसला था, जिसने उन्हें ना तो झूकने दिया ना टूटने।
परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय मां कंचन देवी ने संघर्ष का रास्ता चुना। गौरी स्वयं सहायता समूह और आदर्श जीविका ग्राम संगठन की सदस्य बनीं। समूह से 30 हजार रुपये का ऋण लेकर उन्होंने अपने पति को व्यापार के लिए प्रेरित किया। इस पैसे से लकड़ी खरीदकर कोयला बनाने का काम शुरू किया।
धीरे-धीरे यह कारोबार चल पड़ा और परिवार के लिए आय का स्थायी साधन बना। कंचन देवी ने तय किया कि चाहे कितनी भी आर्थिक परेशानियां क्यों न आए, उनकी बेटी की पढ़ाई कभी नहीं रुकेगी। यही संकल्प बुच्ची कुमारी की सफलता की वजह बनी।
हर कदम में हिम्मत बन कर साथ रहीं मां
मां की प्रेरणा और त्याग ने बुच्ची कुमारी के अंदर पढ़ाई को लेकर गहरी लगन पैदा की। मैट्रिक परीक्षा में उन्होंने अपने विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इंटरमीडिएट और स्नातक में भी लगातार प्रथम स्थान पर रहीं। उच्च शिक्षा के लिए उन्हें दरभंगा आना-जाना पड़ता था।
बच्ची ने मेहनत जारी रखी और घर में ही बीपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। वर्ष 2021 में बीपीएससी की परीक्षा सफलतापूर्वक पास की। पहले उन्हें कर्मचारी पद पर नियुक्ति मिली, लेकिन मेहनत व लगन से आज वह अंचलाधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। इससे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति भी सुधर रही है।
अब वह अपने मां का आर्थिक सहयोग करती हैं। अपने छोटे भाई-बहनों को भी पढ़ाई में मदद कर रही हैं। बुच्ची कुमारी अपनी सफलता का श्रेय मां कंचन देवी को देती हैं। कहती हैं कि मां ने अपने संघर्ष के बूते हमारे परिवार की स्थिति बदली है।
अगर ऋण लेकर व्यापार शुरू नहीं किया गया होता तो शायद पढ़ाई बीच में ही छूट जाती, लेकिन मां ने हिम्मत दी और पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। आज मैं जिस मुकाम पर हूं, वह मां की ही देन है।


