‘गिरफ्तारी के लिए 60 पुलिसवाले घर पहुंच गए’, पवन खेड़ा की जमानत याचिका पर SC में जोरदार बहस

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। खेड़ा ने यह याचिका असम पुलिस द्वारा दर्ज FIR के सिलसिले में अग्रिम जमानत की मांग करते हुए दायर की थी।

यह FIR मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी, रिनिकी भुइयां सरमा की शिकायत पर दर्ज की गई थी। शिकायत में खेड़ा पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने दावा किया था कि रिनिकी भुइयां सरमा के पास कई पासपोर्ट हैं।

जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें उन्होंने गुवाहाटी हाई कोर्ट द्वारा उनकी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।

खेड़ा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी बात की शुरुआत यह कहते हुए की कि, यह एक अभूतपूर्व मामला है, क्योंकि इसमें सरकारी वकील के भी बॉस के बॉस के बॉस के बयान शामिल हैं। उनका इशारा असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा सार्वजनिक रूप से दिए गए कुछ बयानों की ओर था।

सिंघवी ने कोर्ट में कहा सीएम के बयान पढ़े नहीं जा सकते

सिंघवी ने कहा कि, “वह खुली अदालत में सरमा के कुछ बयानों को पढ़कर नहीं सुना सकते, क्योंकि उनमें कुछ ऐसे शब्द इस्तेमाल किए गए हैं जिन्हें छापा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि सरमा ने धमकी दी है कि, खेड़ा अपनी बाकी की जिंदगी असम की जेल में बिताएंगे।

सिंघवी ने दलील दी, “अगर डॉ. अंबेडकर को यह अंदाजा होता कि कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह की बात करेगा, तो वह अपनी कब्र में भी करवटें बदलते रहते।” सिंघवी ने आगे कहा कि “इस मामले का मूल मुद्दा मानहानि और प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के आरोप हैं, और इसमें गिरफ्तारी या हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कोई जरूरत नहीं थी।

सिंघवी ने आगे कहा, “चलिए मान लेते हैं कि आखिरकार मुझे दोषी ठहरा दिया जाता है। लेकिन फिर भी गिरफ्तारी की क्या जरूरत है? इस मामले में ऐसा क्या है जिसे बिना गिरफ्तारी के नहीं किया जा सकता?” उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त उपाय अपनाए जा सकते हैं कि खेड़ा कहीं भाग न जाएं और जांच में पूरा सहयोग करें।

FIR में दर्ज ज्यादातर अपराध जमानती हैं

उन्होंने पूछा, “हिरासत में लेकर पूछताछ करके किसी को अपमानित करना क्यों जरूरी है?” सिंघवी ने कहा कि खेड़ा को गिरफ्तार करने के लिए असम पुलिस के लगभग 50-60 जवान निजामुद्दीन पहुंच गए थे, मानो “वह कोई आतंकवादी हों।” उनके अनुसार, FIR में दर्ज ज्यादातर अपराध जमानती हैं।

इसके बाद सिंघवी ने हाई कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाया, क्योंकि उसमें BNS की धारा 339 (जाली दस्तावेज रखना) का जिक्र किया गया है, जबकि इस अपराध का जिक्र न तो शिकायत में है और न ही FIR में।

सिंघवी ने यह भी कहा कि धारा 339 एक जमानती अपराध है। लेकिन न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने यह बताया कि धारा 339 अपराधों के विभिन्न स्तरों का उल्लेख करती है, जिनमें से कुछ के लिए आजीवन कारावास का दंड है, और कुछ के लिए 7 वर्ष तक के कारावास का दंड है।

ट्रायल में सभी आरोप तय होने चाहिए

सिंघवी ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि, हाई कोर्ट ने शिकायतकर्ता (रिंकी भुइयां सरमा) को “निर्दोष महिला” कहा; उनका तर्क था कि यह मामला ट्रायल में तय किया जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर पहले ही कोई राय बना ली थी। सिंघवी ने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत मिली व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए।

उन्होंने इस बात पर रोशनी डाली कि खेड़ा कोई “पक्के अपराधी” नहीं हैं, बल्कि एक सक्रिय राजनेता हैं, और यह मामला असल में याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए कुछ राजनीतिक आरोपों का एक राजनीतिक जवाब है। असम राज्य की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस याचिका का विरोध किया।

उन्होंने बेंच को शिकायत के हर पहलू से अवगत कराया ताकि यह दिखाया जा सके कि इसमें अपराध बनता है। SG ने कहा कि खेड़ा ने आरोप लगाया था कि, मुख्यमंत्री की पत्नी के पास तीन अन्य देशों के पासपोर्ट हैं, और उन्होंने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कथित पासपोर्ट की कुछ तस्वीरें भी दिखाई थीं। हालांकि, जांच से पता चला है कि दिखाई गई तस्वीरें नकली थीं।

SG ने चुनाव में गलत तरीके से दखल देने का लगाया आरोप

SG ने आगे कहा कि अमेरिका में रजिस्टर्ड एक कंपनी से जुड़े कुछ नकली दस्तावेज भी दिखाए गए थे। SG ने कहा कि खेड़ा से हिरासत में पूछताछ करना जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि उनके साथी कौन थे, और यह समझा जा सके कि क्या शिकायतकर्ता के नाम पर पासपोर्ट बनवाने में किसी विदेशी ताकत का हाथ था।

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस द्वारा जुटाई गई पूरी जानकारी इस मोड़ पर सार्वजनिक नहीं की जा सकती। SG ने कहा कि “FIR दर्ज होने के बाद से खेड़ा फरार चल रहे हैं, और यह कोई साधारण मानहानि का मामला नहीं है।” SG ने कहा, “एक जांच एजेंसी के तौर पर, मैं यह जानना चाहूंगा कि आपने ये नकली दस्तावेज कैसे बनाए? आपका इरादा क्या था?

अगर आपने इन्हें नकली नहीं बनाया, तो आपको ये किसने दिए? वे कौन से विदेशी तत्व थे जो हमारे चुनावों में दखल देने में दिलचस्पी रखते थे? हिरासत में पूछताछ, पूछताछ के अन्य तरीकों से गुणात्मक रूप से अलग होती है।”

क्या है पूरा मामला ?

यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा द्वारा कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के खिलाफ गुवाहाटी क्राइम ब्रांच पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई एक FIR से जुड़ी है। ये आरोप खेड़ा के उन सार्वजनिक दावों से संबंधित हैं, जिनमें उन्होंने कहा था कि सरमा के पास कई विदेशी पासपोर्ट हैं और विदेशों में उनके वित्तीय हित भी हैं।

FIR में भारतीय न्याय संहिता के कई प्रावधानों का ज़िक्र किया गया है, जिनमें धारा 175 (चुनाव के संबंध में झूठा बयान), 318 (धोखाधड़ी), 338 (कीमती दस्तावेज या वसीयत की जालसाजी), 337 (सरकारी रिकॉर्ड की जालसाजी), 340 (जाली दस्तावेज को असली के तौर पर इस्तेमाल करना), 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) और 356 (मानहानि) शामिल हैं।

खेड़ा ने शुरू में तेलंगाना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसने 10 अप्रैल को उन्हें एक हफ्ते की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दे दी, ताकि वे असम की संबंधित अदालत से नियमित राहत की मांग कर सकें। इसके बाद 15 अप्रैल को, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी। साथ ही, उसने यह भी साफ किया कि अगर खेड़ा असम में अधिकार क्षेत्र वाली अदालत में अग्रिम जमानत के लिए अर्जी देते हैं, तो उस अर्जी पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने खेड़ा की उस अर्जी को भी खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने रोक हटाने की मांग की थी, और साथ ही उस अनुरोध को भी जिसमें उन्होंने असम की अदालत तक पहुंचने में मदद के लिए अपनी सुरक्षा की अवधि बढ़ाने की मांग की थी। इसके बाद, खेड़ा ने अग्रिम जमानत के लिए गुवाहाटी हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने भी उनकी अर्जी को खारिज करते हुए कहा कि, यह मामला सिर्फ मानहानि का नहीं है, और खेड़ा द्वारा जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया गया है, उनके स्रोत का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है। हाई कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि खेड़ा कई पासपोर्ट और विदेशी निवेशों के संबंध में अपने आरोपों को साबित करने में नाकाम रहे हैं, और यह भी कहा कि उन्होंने एक निजी व्यक्ति को राजनीतिक विवाद में घसीटने का काम किया।

 

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