“इतने मीठे भी न बनें कि दुनिया निगल जाए”, जानिए क्यों हद से ज्यादा अच्छाई बन सकती है आपकी कमजोरी

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बचपन से हमें सिखाया जाता है- “सबके साथ अच्छे रहो,” “सबकी मदद करो,” लेकिन क्या कभी किसी ने आपको बताया कि ‘हद से ज्यादा अच्छा’ होना भी खतरनाक हो सकता है? एक पुरानी कहावत है- “इतने कड़वे मत बनो कि कोई थूक दे, और इतने मीठे मत बनो कि कोई निगल जाए।” आज की दुनिया में यह बात सौ प्रतिशत सच है। आइए जानते हैं कि कैसे जरूरत से ज्यादा अच्छाई आपकी ही दुश्मन बन सकती है।

‘ना’ कहना हो जाता है मुश्किल

क्या आप उन लोगों में से हैं जो अपना जरूरी काम छोड़कर दूसरों की मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं? अगर हां, तो सावधान हो जाइए। जब आप हर बात पर ‘हां’ कहते हैं, तो लोग आपकी अच्छाई को आपका ‘फर्ज’ समझने लगते हैं। उन्हें लगने लगता है कि आप हमेशा उपलब्ध हैं। धीरे-धीरे लोग आपकी कद्र करना बंद कर देते हैं क्योंकि जो चीज आसानी से मिल जाती है, उसकी कीमत कोई नहीं समझता।

‘हल्के’ में लेने लगते हैं लोग

जरूरत से ज्यादा अच्छे लोगों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि दुनिया उन्हें कमजोर समझने की गलती करती है। जब आप गलत बात पर भी गुस्सा नहीं करते या विरोध नहीं जताते, तो लोग सोचते हैं कि “अरे, यह तो कुछ नहीं कहेगा।” यह व्यवहार आपको ऑफिस में, दोस्तों के बीच और यहां तक कि परिवार में भी पीछे धकेल सकता है। आपकी राय की अहमियत खत्म हो जाती है।

आपकी अपनी मानसिक शांति का क्या?

दूसरों को खुश रखने के चक्कर में अक्सर हम अपनी खुशियों का गला घोंट देते हैं। जब आप अपनी जरूरतों को नजरअंदाज करके दूसरों के लिए जीते हैं, तो अंदर ही अंदर एक गुस्सा और चिड़चिड़ापन पनपने लगता है। आप खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। यह स्थिति आपको मानसिक तनाव और डिप्रेशन की ओर ले जा सकती है। याद रखें, आप खाली कप से किसी और के लिए चाय नहीं डाल सकते, पहले आपको खुद को भरना होगा।

क्या बुरा बन जाना है समाधान?

बिल्कुल नहीं! अच्छाई इंसान का सबसे सुंदर गहना है, इसलिए आपको इसे उतारना बिल्कुल नहीं है। बस इसके साथ थोड़ी ‘समझदारी’ को अपनाने की जरूरत है, क्योंकि अच्छा होने और ‘बेवकूफ’ होने में फर्क होता है।

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