एक वीडियो ने बदली पलामू के शिक्षक की तकदीर, मशरूम की खेती से हर रोज होती है हजारों की कमाई

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प्रखंड के पोची पंचायत अंतर्गत हलुमाड़ गांव के सखुआटाड़ टोला निवासी लीलू सिंह अपनी पत्नी सरिता देवी और पुत्र ओमप्रकाश सिंह के साथ मिलकर ऑयस्टर मशरूम की खेती कर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रहे हैं।

सीमित संसाधनों के बावजूद यह परिवार मेहनत और लगन के बल पर मशरूम उत्पादन कर स्थानीय बाजार में अपनी अलग पहचान बना रहा है।

लीलू सिंह पोची पंचायत के लोथरवा टोला में पारा शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि करीब डेढ़ वर्ष पहले मोबाइल पर मशरूम खेती से जुड़ा वीडियो देखने के बाद उनके मन में इसे घर पर शुरू करने का विचार आया।

शुरुआती दौर में उन्होंने डालटनगंज से सात-आठ रुपये प्रति पैकेट की दर से बीज लाकर प्रयोग के तौर पर खेती शुरू की। पहली बार में ही अच्छी उपज मिलने से उनका उत्साह बढ़ा और आसपास के लोग भी जानकारी लेने आने लगे।

इसके बाद उन्होंने हिम्मत जुटाकर छत्तीसगढ़ से करीब 2500 रुपये का बीज मंगाया। इस बार उम्मीद से अधिक उत्पादन हुआ, जिसे आसपास के क्षेत्रों में बेचकर उन्होंने अच्छी आमदनी प्राप्त की। सफलता मिलने के बाद उन्होंने इसे व्यवस्थित रूप से व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

पढ़ाई के साथ खेती को बना रहे रोजगार

पुत्र ओमप्रकाश सिंह, जो इंटर साइंस उत्तीर्ण कर वर्तमान में बीए पार्ट-वन के छात्र हैं, बताते हैं कि आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के कारण उन्होंने पढ़ाई के साथ मशरूम उत्पादन को व्यवसाय के रूप में जारी रखा।

चार माह पूर्व उन्होंने पोखराहा में 10 से 12 दिनों का प्रशिक्षण भी लिया। वे तैयार मशरूम को कभी प्रखंड कार्यालय तो कभी सतबरवा बाजार में ले जाकर बेचते हैं। उनका कहना है कि भले ही आय का पूरा हिसाब नहीं रखा गया हो, लेकिन दूसरे राज्यों में मजदूरी करने की तुलना में यह कार्य बेहतर साबित हो रहा है।

पत्नी भी निभा रही महत्वपूर्ण भूमिका

इस कार्य में पत्नी सरिता देवी भी बराबर की भागीदार हैं। वे मशरूम को सुखाकर पैकिंग करने के साथ बादाम और मसाला युक्त उत्पाद तैयार करने का काम संभालती हैं। उनका कहना है कि घर पर खाली बैठने से बेहतर है कि कुछ न कुछ उत्पादक कार्य किया जाए।

वर्तमान में परिवार करीब 200 से अधिक थैलों में ऑयस्टर मशरूम की खेती कर रहा है। बांस, तिरपाल और रस्सी जैसी अधिकांश सामग्री घर पर उपलब्ध होने से लागत भी कम आती है, हालांकि इसमें मेहनत काफी लगती है।

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