एक वार, 25 साल इंतजार, 94 साल की उम्र हाई कोर्ट ने हत्या को गैर-इरादतन माना, आदेश- जिनती सजा काटी, काफी
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 25 वर्ष पुराने सनसनीखेज हत्या मामले में बड़ा और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए आजीवन कारावास की सजा को घटा दिया है। कोर्ट ने माना कि यह हत्या नहीं बल्कि गैर-इरादतन हत्या का मामला है। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई धारा 302 आईपीसी की सजा को बदलकर धारा 304 पार्ट-1 आईपीसी के तहत कर दिया गया और 94 वर्ष के बुजुर्ग अभियुक्त स्वर्ण सिंह को “पहले से भुगती गई सजा” को ही अंतिम मानते हुए रिहाई का रास्ता साफ कर दिया।
हाई कोर्ट के जस्टिस एनएस शेखावत और जस्टिस एचएस ग्रेवाल ने यह आदेश अमृतसर निवासी स्वर्ण सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका के अनुसार यह घटना 4/5 दिसंबर 2000 की रात करीब 7 बजे की है। गांव खासा (अमृतसर) में खेतों से लौटते समय बलजिंदर सिंह की स्वर्ण सिंह और उसके बेटे हरजीत सिंह से कहासुनी हो गई। दोनों पक्षों के बीच अचानक झगड़ा हुआ।
2003 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई
पुलिस ने जांच के बाद स्वर्ण सिंह के खिलाफ धारा 302 आईपीसी में चालान पेश किया। 2003 में ट्रायल कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ “एक वार” होना अपने आप में हत्या या गैर-हत्या का पैमाना नहीं हो सकता।
यह देखना जरूरी है कि क्या हमला पूर्व नियोजित था, क्या आरोपित ने क्रूरता या अनुचित लाभ उठाया, क्या घटना अचानक झगड़े में हुई।
कोर्ट ने पाया कि यह घटना अचानक हुई झड़प में हुई थी, कोई पूर्व योजना नहीं थी और आरोपित ने केवल एक ही वार किया था। इसलिए इसे हत्या (302) नहीं बल्कि गैर-इरादतन हत्या माना गया।


