भागीरथपुरा क्षेत्र में नलों से गंदा पानी आने की समस्या नगर निगम को चार साल पहले ही पता चल चुकी थी। तत्कालीन नगर निगम आयुक्त प्रतिभा पाल ने इसे गंभीर मानते हुए पाइपलाइन बदलने का टेंडर भी जारी कर दिया था। लेकिन टेंडर प्रक्रिया पूरी होने और काम शुरू करने संबंधी पत्र जारी होने के बावजूद महापौर और अन्य अधिकारियों के हस्ताक्षरों में ही करीब तीन महीने की देरी हो गई।
काम शुरू तो हुआ, लेकिन साढ़े तीन साल बीतने के बाद भी आज तक पूरा नहीं हो सका। निगम रिकॉर्ड से बाहर आई नोटशीट ने इस लापरवाही और देरी (Indore Water Contamination) की पूरी कहानी उजागर कर दी है। इसके बाद अब यह सवाल उठने लगे हैं कि जब महापौर स्तर पर ही अत्यंत जरूरी काम की फाइल महीनों तक रोकी गई, तो पूरी जिम्मेदारी अधिकारियों पर डालना कितना उचित है?
टेंडर जारी, फाइल महीनों अटकी
25 नवंबर 2022 को हुई महापौर परिषद (Indore News) की बैठक के संकल्प क्रमांक 106 के तहत टेंडर जारी किए गए थे। वार्ड 11 के भागीरथपुरा टंकी क्षेत्र में पाइपलाइन बदलने के लिए 2 करोड़ 38 लाख रुपये का टेंडर जुलाई 2022 में हो चुका था। इसकी स्वीकृति के लिए 23 नवंबर 2022 को जलकार्य समिति को प्रस्ताव भेजा गया।
इसके बावजूद फाइल पर अपर आयुक्त के हस्ताक्षर 3 फरवरी 2023 को हुए और महापौर के साइन 6 फरवरी को जाकर हो सके।
इसके बाद वर्क ऑर्डर जारी हुआ, लेकिन हैरानी की बात यह है कि साढ़े तीन साल बाद भी यह काम अधूरा है। निगम के जिम्मेदार अधिकारियों के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है।
समय पर होता काम, बच सकती थीं जानें
जानकारी के अनुसार पूरे भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल पाइपलाइन का काम दो चरणों में होना था। सवा दो करोड़ से अधिक लागत वाला पहला चरण अगर समय पर पूरा हो जाता, तो कम से कम आधी बस्ती दूषित पानी से सुरक्षित हो जाती। माना जा रहा है कि इससे कई लोगों की जान भी बच सकती थी।
महापौर का तर्क, सिंगल बिडर था
फाइल पर तीन महीने की देरी को लेकर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सफाई दी है। उन्होंने कहा कि इस टेंडर में केवल एक ही निविदाकर्ता था। मालवा इंजीनियर्स नामक ठेकेदार का पूर्व कार्य संतोषजनक नहीं था, इसलिए परीक्षण जरूरी था। इसी कारण साइन में समय लगा।
महापौर के मुताबिक पाइपलाइन बिछाने का लगभग 85 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। बारिश और भुगतान संबंधी अड़चनों के कारण देरी हुई है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि काम को समय पर पूरा कराना अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
अब सवाल यही है कि जब चेतावनी पहले मिल चुकी थी और संसाधन भी उपलब्ध थे, तो भागीरथपुरा के लोगों को दूषित पानी की मार क्यों झेलनी पड़ी?

