16 दिसंबर 1971… यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की वह गौरवशाली दास्तान है। जिसे पढ़ते हुए आज भी रगों में रोमांच दौड़ जाता है। इस दिन की तस्वीरें आप गूगल पर खोजेंगे तो सामने भारतीय सेना का अदम्य साहस, अनुशासन और रणनीतिक दक्षता की स्वर्णिम गाथा उभर आएगी।
1971 में पाकिस्तानी सेना की क्रूर कार्रवाइयों और दमनचक्र ने जब जंग को अनिवार्य बना दिया, तब भारत ने सिर्फ जवाब ही नहीं दिया, बल्कि ऐसा प्रहार किया कि दुनिया का भू-राजनीतिक नक्शा ही बदल गया। रणनीति को भी नए आयाम मिलेे। महज 13 दिनों में भारतीय सेना ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी हार दर्ज कराई। 93 हजार से अधिक सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया और उसी क्षण दक्षिण एशिया में एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का उदय हुआ।
वर्तमान में, दशकों बाद बांग्लादेश एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और आर्थिक संकट की गिरफ्त में है। ऐसे समय में ‘विजय दिवस’ हमें उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है, जब भारत ने अत्याचार की आग में झुलस रहे लोगों को स्वतंत्रता दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई थी और दक्षिण एशिया की शक्ति-संतुलन में अपनी निर्णायक भूमिका भी स्थापित की। यह दिन सैन्य विजय का प्रतीक के साथ ही भारत की दूरदर्शी कूटनीति, सामरिक क्षमता और मानवता के प्रति उसकी अटूट प्रतिबद्धता का स्मरण भी है।
16 दिसंबर 1971 को जो हुआ, उसकी कहानी 1947 से शुरू होती है, जब पाकिस्तान धर्म के आधार पर एक नया राष्ट्र बना। आज जब बांग्लादेश एक बार फिर हिंसा के कारण अशांत है, तब समझना जरूरी है कि आखिर वे कौन-से मुद्दे थे, जब पाकिस्तान अपने ही पूर्वी हिस्से को खोने की ओर बढ़ा था? आइए हम आपको बताते हैं…
पाकिस्तान की वह शुरुआत, जिसने लिखा बंटना…
14 अगस्त 1947 को धर्म के आधार पर पाकिस्तान बना। इस नए नवेले देश के दो हिस्से थे- पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान। पाकिस्तान की 56% आबादी पूर्वी पाकिस्तान में रहती थी और उनकी भाषा बांग्ला थी, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में पंजाबी, सिंधी, बलूची और पश्तो जैसी भाषाएं बोली जाती थीं। भारत से पलायन कर पाकिस्तान पहुंचे मुस्लिम भी पश्चिमी पाकिस्तान में रहते थे, जिन्हें शरणार्थी कहा जाता था।
पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं को बांग्ला भाषा से दिक्कत थी। उनका मानना था कि इस भाषा पर हिंदुओं का असर है। इसलिए बांग्ला को ‘राष्ट्रीय भाषा’ मानने से इनकार कर दिया। सरकारी कामकाज में बांग्ला भाषा के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई।
डच प्रोफेसर विलियम वॉन शिंडल ने ‘ए हिस्ट्री ऑफ बांग्लादेश’ में लिखा- ‘पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाबी नेता मानते थे कि पाकिस्तान की भाषा सिर्फ उर्दू हो सकती है।’
मार्च 1948 में ढाका गए जिन्ना ने खुलेआम एलान किया था- ‘पाकिस्तान की राजकीय भाषा सिर्फ उर्दू होगी। जो भी इसका विरोध करेगा, वह पाकिस्तान का दुश्मन होगा।’ यहीं से पूर्वी पाकिस्तान की नाराजगी ने विद्रोह का रूप लेना शुरू कर दिया।
बहुसंख्यकों को फैसले लेने का हक नहीं
ध्यान देने वाली बात यह है कि पश्चिमी पाकिस्तान में बांग्ला भाषा बोलने वाले लोग न के बराबर थे। डच प्रोफेसर विलियम वॉन शिंडल ने अपनी किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ बांग्लादेश’ में लिखा,’ पश्चिमी पाकिस्तान में रहने वाले पश्चिमी पंजाब के मुसलमान ही देश के लिए अच्छे-बुरे सभी फैसले करते थे। देश की बागडोर इन्हीं के हाथों में थी, जबकि आबादी के लिहाज से देखा जाए तो पूर्वी पाकिस्तान का वर्चस्व होना चाहिए था, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था।
4 साल बाद शुरू हुआ भाषा आंदोलन
बांग्ला भाषा की अवहेलना ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को आक्रोश से भर दिया। न भाषा उनकी, न नीतियां उनको ध्यान में रखकर बनाई जातीं। न उनके दुख-दर्द और समस्यों को ख्याल रखा जाता। हद तब हो गई, जब भाषा की मांग को लेकर साल 1952 में भाषा आंदोलन हुआ और कई छात्रों की जान गई। यह आंदोलन सिर्फ भाषा का नहीं था- यह पहचान, संस्कृति और सम्मान का संघर्ष था। इसके साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक भेदभाव के खिलाफ उठी बुलंद आवाज थी।
पूर्वी पाकिस्तान में रहने वालों के हालात का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि पश्चिमी पाकिस्तान के नेता पूर्वी पाकिस्तानियों को अक्सर अपमानजनक शब्दों से पुकारते, उन्हें कमजोर और हीन मानते। अगर वे पुलिस के पास मदद के लिए जाते तो पुलिस और प्रशासन उनके खिलाफ ही कार्रवाई करता। इस सबसे लोगों का गुस्सा उबलने लगा और यही गुस्सा आगे चलकर अलग देश बांग्लादेश बन गया।
अवामी लीग और शेख मुजीबुर्रहमान का उभार
पूर्वी पाकिस्तानियों पर जब जुर्म हद से ज्यादा बढ़ गए और विरोध के स्वर भी बुलंद होने लगे तब पूर्वी पाकिस्तान की राजनीतिक चेतना को अवामी लीग और उसके नेता शेख मुजीबुर्रहमान ने दिशा दी। शेख मुजीबुर्रहमान यानी बांग्लादेश से जान बचाकर भारत में शरण लेने वाली शेख हसीना के पिता।
मुजीबुर्रहमान ने आर्थिक भेदभाव, राजनीतिक असमानता और विकास की कमी के खिलाफ आवाज उठाई। इस कारण में पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं की आंखों में चुभने लगे। साल 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के बाद शेख मुजीबुर्रहमान ने स्पष्ट मांग रखी कि दोनों प्रांतों के आर्थिक विकास में एकरूपता जरूरी है। इससे खफा पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं ने उन्हें 1968 में ‘अगरतला षड्यंत्र’ केस में फंसा दिया। उन पर भारत के साथ मिलकर पाकिस्तान को तोड़ने का आरोप लगाया गया।
रही-सही कसर 1970 के चुनाव ने पूरी कर दी
साल 1970 में पाकिस्तान में हुए आम चुनाव में अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की 169 में से 167 सीटें जीतीं। सत्ता का जनादेश साफ था- शेख मुजीबुर्रहमान प्रधानमंत्री बनेंगे, लेकिन सैन्य तानाशाह याह्या खान और जुल्फिकार अली भुट्टो पूर्वी पाकिस्तान को सत्ता देने के खिलाफ थे। याह्या खान ने सत्ता हस्तांतरण टाल दिया। फिर क्या था- पूर्वी पाकिस्तान में गुस्सा फूट पड़ा। 7 मार्च 1971 को ढाका के रेसकोर्स मैदान में बंगबंधु ने ऐतिहासिक भाषण दिया- यहीं से पूर्वी पाकिस्तान की स्वतंत्रता तय हो गई।
पाकिस्तान के टुकड़े होने से रोकने के लिए बाथरूम में बातचीत
पाकिस्तान के आलाकमान को समझ आने लगा था कि हालत दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। 15 मार्च 1971 को याह्या खान ढाका पहुंचे। शेख मुजीबुर्रहमान से एकांत में बातचीत करना चाहते थे, इसलिए दोनों की बैठक के लिए बाथरूम में दो कुर्सियां डाली गईं। यहां बातचीत हुई, लेकिन यह बैठक भी निष्फल रही। एक और कोशिश हुई। 19 मार्च, 1971 को भुट्टो ढाका पहुंचे। फिर तीनों मिले, माहौल हल्का करने की कोशिश हुई। भुट्टो और मुजीब में थोड़ी सहमति बनी, लेकिन यह बहुत कम समय तक टिक पाई।
23 मार्च: पूर्वी पाकिस्तान में ‘विरोध दिवस’, सब बदल गया
23 मार्च को अवामी लीग ने स्वतंत्रता का झंडा फहरा दिया। पश्चिमी पाकिस्तान की नजर में यह सीधी बगावत थी। ढाका टीवी ने पाकिस्तान का राष्ट्रगान बजाने से इनकार कर दिया। घर–घर में बांग्लादेश के झंडे लगे थे। पाकिस्तानी सेना ने अवामी लीग को ‘अलगाववादी संगठन’ घोषित कर दिया।

