‘मुस्लिम महिलाओं की गरिमा को सर्वोपरि रखें अदालतें’, तलाक से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए 1986 में बनाए गए कानून की व्याख्या करते समय समानता, गरिमा और स्वायत्तता को सर्वोपरि रखना जरूरी है।

अदालत ने कहा कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पितृसत्तात्मक भेदभाव हकीकत है, इसलिए कानून की व्याख्या महिलाओं के वास्तविक जीवन अनुभवों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।

कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को एसी ने किया रद

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ यह तय कर रही थी कि क्या विवाह के समय महिला के पिता द्वारा दिए गए सामान या दूल्हे को दी गई वस्तुएं तलाक के बाद महिला को वापस मिल सकती हैं। शीर्ष अदालत ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसने पूर्व पति को इन वस्तुओं को लौटाने से राहत दे दी थी। महिला ने 1986 के मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम की धारा तीन के तहत 17.67 लाख से अधिक की संपत्ति की वापसी की मांग की थी।

पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने प्रकरण को केवल एक सिविल विवाद की तरह देखा और कानून की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या करने में विफल रहा। अदालत ने कहा कि संविधान का लक्ष्य समानता सुनिश्चित करना है और न्यायालयों को अपने निर्णयों में सामाजिक न्याय को आधार बनाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिया ये आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने महिला की अपील स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि पूर्व पति तीन कार्यदिवस के भीतर महिला के बैंक खाते का विवरण प्राप्त कर राशि सीधे उसके खाते में जमा करे। अनुपालन न होने पर नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। यह विवाह 2005 में हुआ था और मतभेदों के चलते महिला 2009 में ससुराल छोड़ गई थी। 2011 में तलाक के बाद उसने 1986 के कानून के तहत दावा दायर किया था।

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