CJI सूर्यकांत पर टिप्पणी मामले में केरल कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, पूछा- माफी दिल से मांगी या सिर्फ कागज पर?
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के पदाधिकारियों को नोटिस जारी किया है। शुक्रवार, 6 नवंबर को सुनवाई के दौरान अदालत ने पार्टी की ओर से मांगी गई बिना शर्त माफी पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह यह जांचेगी कि माफी वास्तव में दिल से मांगी गई है या केवल कागजों तक सीमित है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ कर रही थी। यह याचिका अधिवक्ता विनीत जिंदल की ओर से दायर की गई थी, जिसमें कांग्रेस की केरल इकाई के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर CJI को लेकर की गई टिप्पणी पर कार्रवाई की मांग की गई थी।
क्या है पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत 12 अक्टूबर को कांग्रेस की केरल इकाई के आधिकारिक एक्स अकाउंट पर प्रकाशित एक पोस्ट से हुई थी। इस पोस्ट में CJI सूर्यकांत से इस्तीफा देने की मांग की गई थी और उनकी जगह किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करने जैसी टिप्पणी की गई थी। विवाद बढ़ने के बाद पोस्ट को हटा लिया गया।
इसके बाद केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सनी जोसेफ ने 27 अक्टूबर को CJI के प्रति बिना शर्त माफी मांगी थी। पार्टी की ओर से कहा गया था कि यह पोस्ट नेतृत्व की जानकारी और मंजूरी के बिना प्रकाशित की गई थी। पार्टी ने यह भी कहा कि संबंधित व्यक्ति को जिम्मेदारी से हटा दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने माफी पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान केरल कांग्रेस के वकील ने अदालत को बताया कि पोस्ट पदाधिकारियों की मंजूरी के बिना अपलोड की गई थी और बाद में उसे हटा दिया गया। इस पर न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने टिप्पणी की कि अदालत यह देखेगी कि माफी कलम से लिखी गई है या दिल से मांगी गई है।
पीठ ने कहा कि संविधान सर्वोच्च है और कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक संगठन इससे ऊपर नहीं है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता संवैधानिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक फैसलों की आलोचना की जा सकती है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल न्याय प्रशासन में डर या हस्तक्षेप पैदा करने के लिए नहीं किया जा सकता।
सभी पदाधिकारियों को जारी हुआ नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने KPCC के अध्यक्ष और सचिव सहित सभी पदाधिकारियों को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। अदालत ने फिलहाल पदाधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दी है।
पीठ इस बात पर भी विचार करेगी कि मामले में संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आधार बनता है या नहीं। अदालत ने मामले में सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं और अटॉर्नी जनरल की मदद लेने की बात भी कही है।
मामले की अगली सुनवाई 15 दिसंबर को होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी गई है। अब सभी संबंधित पदाधिकारियों के जवाब और अदालत की आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

