भारत में जलवायु संकट से हर साल 13 अरब डॉलर का खाद्य नुकसान, खेतों से लेकर रसोई तक बढ़ी मुश्किलें

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भारत में जलवायु परिवर्तन का असर अब सिर्फ मौसम और पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव देश की खाद्य व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। बदलते मौसम, बेमौसम बारिश, भीषण गर्मी, सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक घटनाओं के कारण हर साल भारत को करीब 13 अरब डॉलर का खाद्य नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह संकट खेतों में फसल उत्पादन से लेकर घरों की रसोई तक पहुंच गया है।

दरअसल, जलवायु संकट के कारण खेती-किसानी का पूरा गणित प्रभावित हो रहा है। कभी जरूरत से ज्यादा बारिश फसलों को बर्बाद कर देती है, तो कभी लंबे समय तक बारिश नहीं होने से खेत सूखे रह जाते हैं। वहीं, तापमान में लगातार बढ़ोतरी का असर फसलों की पैदावार और गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है।

खेतों में फसलें हो रहीं प्रभावित

भारत में बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। ऐसे में मौसम में होने वाला बदलाव किसानों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहा है। गेहूं, चावल, दालों, सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों पर तापमान और बारिश के बदलते पैटर्न का असर देखा जा रहा है।

अत्यधिक गर्मी के कारण फसलों की वृद्धि प्रभावित होती है, जबकि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि तैयार फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा सूखे की स्थिति में सिंचाई और उत्पादन की लागत भी बढ़ जाती है।

खाद्य आपूर्ति व्यवस्था पर बढ़ता दबाव

जलवायु संकट का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। फसल की कटाई के बाद भंडारण, परिवहन और वितरण के दौरान भी खाद्य पदार्थों का नुकसान होता है।

अत्यधिक गर्मी के कारण फल, सब्जियां और अन्य जल्दी खराब होने वाले खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कई जगहों पर पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज और परिवहन सुविधाओं की कमी इस समस्या को और गंभीर बना देती है।

आम आदमी की रसोई तक पहुंचा असर

जब फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है और खाद्य आपूर्ति में बाधाएं आती हैं, तो इसका असर बाजार में कीमतों पर भी पड़ सकता है। फल, सब्जियों और अनाज की उपलब्धता में कमी होने पर आम उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

इसका सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ता है, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन खरीदने में खर्च होता है। इस तरह जलवायु परिवर्तन खाद्य सुरक्षा और आम लोगों के घरेलू बजट दोनों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

समाधान के लिए क्या कदम जरूरी?

जलवायु संकट से होने वाले खाद्य नुकसान को कम करने के लिए खेती में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल, मौसम की सटीक जानकारी, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और फसलों के सुरक्षित भंडारण पर ध्यान देना जरूरी है।

इसके साथ ही किसानों को जलवायु के अनुकूल बीज उपलब्ध कराने, कोल्ड चेन मजबूत करने और खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी होगी।

कुल मिलाकर, भारत में हर साल 13 अरब डॉलर के खाद्य नुकसान का आंकड़ा जलवायु संकट की गंभीरता को समझने का संकेत देता है। यह चुनौती केवल किसानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की खाद्य व्यवस्था और आम उपभोक्ताओं से जुड़ी हुई है।

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