देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम बारिश कराने की तैयारी तेज हो गई है। रेखा गुप्ता सरकार प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम वर्षा की तकनीक पर काम कर रही है। इस दिशा में दो ट्रायल भी किए जा चुके हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली में आखिर कृत्रिम बारिश कब होगी और क्या इससे प्रदूषण से राहत मिल पाएगी?
दरअसल, सर्दियों की शुरुआत के साथ ही दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता एक बड़ी चुनौती बन जाती है। हवा की गति कम होने, तापमान में गिरावट और मौसमी परिस्थितियों के कारण प्रदूषक तत्व वातावरण में जमा होने लगते हैं। इसका असर आम लोगों की सेहत और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है।
इसी समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार कृत्रिम बारिश के विकल्प पर विचार कर रही है। क्लाउड सीडिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसमें अनुकूल बादलों के भीतर विशेष पदार्थों का इस्तेमाल करके बारिश की संभावना बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। इसके लिए विमान की मदद से बादलों में सीडिंग की जाती है।
हालांकि, इस तकनीक के सफल होने के लिए वातावरण में पर्याप्त नमी और उपयुक्त बादलों का होना जरूरी है। केवल विमान से सीडिंग करने भर से बारिश की गारंटी नहीं होती। यही वजह है कि मौसम की परिस्थितियों का अध्ययन और ट्रायल इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दिल्ली में किए गए दो ट्रायल के बाद अब सरकार की नजर अनुकूल मौसम पर है। कृत्रिम वर्षा कराने के लिए मौसम विभाग और संबंधित विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। बारिश होने की स्थिति में हवा में मौजूद कुछ प्रदूषक कण जमीन पर बैठ सकते हैं, जिससे कुछ समय के लिए वायु गुणवत्ता में सुधार संभव है।
लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, कृत्रिम बारिश प्रदूषण का स्थायी समाधान नहीं है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और अन्य प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण करना भी जरूरी है।
अब देखना होगा कि दिल्ली सरकार को क्लाउड सीडिंग के लिए अनुकूल मौसम कब मिलता है और कृत्रिम बारिश की योजना को कब अमलीजामा पहनाया जाता है। फिलहाल राजधानी के लोग प्रदूषण से राहत मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

