दुनिया में कारोबार करने वाली कंपनियों की संख्या करोड़ों में है, लेकिन इनमें से कुछ कंपनियों का इतिहास इतना पुराना है कि उनकी शुरुआत आज से कई सदियां पहले हुई थी। जापान की कोंगो गुमी (Kongō Gumi) ऐसी ही कंपनी है, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी लगातार चलने वाली कंपनी माना जाता है।
इसकी स्थापना सन 578 में हुई थी और करीब 1,448 साल बाद भी इसका नाम कारोबारी दुनिया में मौजूद है। खास बात यह है कि कंपनी की शुरुआत जिस काम से हुई थी, उससे इसका रिश्ता आज भी जुड़ा हुआ है। कोंगो गुमी का प्रमुख काम बौद्ध मंदिरों के निर्माण और उनकी मरम्मत से रहा है। हालांकि अब यह स्वतंत्र पारिवारिक कंपनी नहीं, बल्कि एक बड़े कंस्ट्रक्शन ग्रुप की सब्सिडियरी के रूप में काम कर रही है।
मंदिर निर्माण से शुरू हुआ यह कारोबार धीरे-धीरे आगे बढ़ा और कंपनी ने धार्मिक इमारतों के अलावा महलों समेत दूसरे निर्माण कार्यों में भी अपनी विशेषज्ञता डेवलप की। कई पीढ़ियों तक कोंगो परिवार के सदस्य ही कंपनी की कमान संभालते रहे और इसी वजह से यह कारोबार सदियों तक एक ही परिवार के भीतर चलता रहा।
कोंगो गुमी की सबसे खास पहचान सिर्फ उसकी उम्र नहीं, बल्कि उसका पारिवारिक संचालन भी रहा है। करीब डेढ़ हजार साल के इतिहास में कंपनी की कमान कोंगो परिवार की अलग-अलग पीढ़ियों के हाथों में रही। मंदिरों के निर्माण और रखरखाव में कंपनी की विशेषज्ञता ने उसे जापान के पारंपरिक निर्माण क्षेत्र में अलग पहचान दिलाई।
लेकिन समय के साथ कारोबार का आर्थिक दबाव बढ़ता गया। सन 2006 में कंपनी गंभीर वित्तीय संकट में फंस गई और उसे दिवालिया स्थिति का सामना करना पड़ा। उस समय तक कंपनी के पास करीब 100 कर्मचारी थे। साल 2005 में इसका वार्षिक रेवेन्यू ¥7.5 बिलियन यानी करीब 4.52 अरब रुपये था, लेकिन इसके ऊपर लगभग 2.5 अरब रुपये का कर्ज भी था।
उस समय कंपनी के आखिरी प्रेसिडेंट मासाकाज़ु कोंगो थे, जिन्हें फर्म का नेतृत्व करने वाला 40वां कोंगो माना जाता है।
2006 में बदला मालिक
वित्तीय संकट के बाद 2006 में कोंगो गुमी को जापान के ताकामात्सु कंस्ट्रक्शन ग्रुप ने खरीद लिया। इसके बाद यह कंपनी स्वतंत्र पारिवारिक कारोबार के बजाय ताकामात्सु ग्रुप की सब्सिडियरी बन गई। हालांकि कंपनी का पुराना नाम और उसकी विशेषज्ञता खत्म नहीं हुई।
आज भी ताकामात्सु ग्रुप के तहत कोंगो गुमी डिवीजन अपने निर्माण संबंधी काम को जारी रखता है और खास तौर पर बौद्ध मंदिरों के निर्माण व मरम्मत से उसका पुराना जुड़ाव बना हुआ है। यानी कंपनी का मालिकाना ढांचा बदल गया, लेकिन 578 में शुरू हुआ उसका कारोबारी सफर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
41वीं पीढ़ी का कनेक्शन भी बरकरार
कोंगो गुमी के इतिहास में परिवार की भूमिका आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कंपनी अब भले ही कोंगो परिवार के सीधे स्वामित्व में नहीं है, लेकिन परिवार का प्रतिनिधित्व अब भी इससे जुड़ा हुआ है। मासाकाज़ु कोंगो के बाद कोंगो परिवार की 41वीं प्रमुख, उनकी बेटी, भी अपनी भूमिका जारी रखे हुए हैं।
इस तरह कोंगो गुमी की कहानी सिर्फ एक पुरानी कंपनी के बचे रहने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी दिखाती है कि करीब 1,400 साल से ज्यादा पुराने कारोबार ने बदलते दौर, आर्थिक संकट और मालिकाना बदलाव के बावजूद अपनी पहचान किस तरह बनाए रखी।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

