भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में तत्काल सुधारों की मांग की है। भारत ने चेतावनी दी है कि 80 साल पुराना इसका ढांचा दुनिया के कुछ सबसे गंभीर संघर्षों को सुलझाने में संघर्ष कर रहा है।
भारत ने क्या कहा?
न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पार्वथानेनी हरीश ने गुरुवार को कहा कि दूसरे विश्व युद्ध से मिली सत्ता सुरक्षा परिषद में उचित प्रतिनिधित्व की कमी की भरपाई नहीं कर सकती।
पार्वथानेनी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद के विस्तार और उसमें समान प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर बोलते हुए कहा, “इसके नतीजे पहले ही सामने आ रहे हैं। 80 साल बीत जाने के बाद भी यह संगठन परिषद के सामने मौजूद कुछ सबसे गंभीर संघर्षों में शांति और सुलह कराने में संघर्ष कर रहा है।”
उन्होंने आगे कहा, “आठ दशक पहले मिली जीत से मिलने वाला अधिकार आज की ऐसी सुरक्षा परिषद की वैधता की कमी को पूरा नहीं कर सकता, जो दुनिया का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती।” भारतीय दूत ने तर्क दिया कि 1945 में जब दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) की स्थापना हुई थी, उसे वैश्विक शासन के लिए एकमात्र आधार नहीं माना जा सकता।
‘रियर व्यू को देखते हुए भविष्य की ओर नहीं बढ़ सकते’
उन्होंने कहा, “कोई भी युद्ध, खासकर वह जो 80 साल से भी पहले हुआ हो आज की दुनिया की स्थिति को तय नहीं करना चाहिए।” उन्होंने आगे कहा, “इतिहास हमें यह बता सकता है कि क्या नहीं करना चाहिए लेकिन आज की चुनौतियों का सामना करने के लिए क्या किया जाना चाहिए यह इतिहास तय नहीं कर सकता। हम लगातार पीछे देखने वाले शीशे (रियर व्यू मिरर) को देखते हुए भविष्य की ओर आगे नहीं बढ़ सकते।”
यूएनएससी में बदलाव की जरूरत
पार्वथानेनी ने विश्व युद्धों में भारत के योगदान पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने तर्क दिया कि युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कई देशों के बलिदानों को उचित मान्यता नहीं मिली।
उन्होंने कहा, “विजेताओं द्वारा, विजेताओं के लिए और विजेताओं से बनी एक संस्था ने जाहिर तौर पर पीड़ितों की चिंताओं को शामिल करने की परवाह नहीं की।” उन्होंने सुरक्षा परिषद से आग्रह किया कि वह अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए खुद में बदलाव लाए।
उन्होंने बताया कि दूसरे विश्व युद्ध में लगभग 25 लाख भारतीयों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से करीब 90,000 लोगों की सैन्य सेवा के दौरान जान चली गई। उन्होंने बंगाल के अकाल का भी जिक्र किया और इसके लिए औपनिवेशिक दौर की युद्धकालीन नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। भारत ने एशिया-प्रशांत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व की ओर भी इशारा किया।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दुनिया की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है लेकिन परिषद में इसके पास केवल एक स्थायी सीट है और इसके अलावा कुछ चुने हुए सदस्य भी समय-समय पर इसमें शामिल होते रहते हैं।
पार्वथानेनी ने कहा, “सुधार का मतलब पुरानी रंजिशें निकालना नहीं है। यह एक ऐसी परिषद में निवेश है जिस पर सभी सदस्य देश भरोसा कर सकें और जिसके परिणामस्वरूप यह और अधिक मजबूत हो सके।”
15 सदस्यीय यूएनएससी में पांच स्थायी सदस्य चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं, जिनके पास वीटो पावर है। इसके अलावा, इसमें दो साल के कार्यकाल के लिए चुने गए 10 सदस्य भी होते हैं। भारत स्थायी और अस्थायी दोनों तरह की सदस्यता के विस्तार का समर्थन करता है। भारत का तर्क है कि अगर बदलाव केवल चुनी हुई सीटों तक सीमित रहे तो मौजूदा असंतुलन बना रहेगा।
यूएनएससी में सुधार की मांग
बातचीत की गति की आलोचना करते हुए परवथानेनी ने कहा, “यह बातचीत नहीं है। यह तो बस यथास्थिति को बनाए रखने जैसा है।” उन्होंने आगे कहा, “सहमति के कुछ बिंदुओं का होना पूर्ण सहमति नहीं है और सबसे कम साझा आधार की तलाश मौजूदा ढांचे में केवल दिखावटी बदलाव करके उसे सुधार बताने का बहाना नहीं बननी चाहिए।”
भारत ने यह भी कहा कि स्थायी सदस्यता के विस्तार में वीटो के सवाल को उचित तरीके से सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “दो-स्तरीय स्थायी सदस्यता असमानता को और अधिक संस्थागत ही बनाएगी।”

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

