गुजराती लोकगीत समझकर करते हैं जिसपर गरबा, असल में निकला बंगाली; रवीन्द्रनाथ टैगोर से जुड़ी हैं इसकी जड़ें

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बॉलीवुड फिल्म ‘गोलियों की रासलीला: रामलीला’ फिल्म में आपने ‘मोर बनी थनगाट करे’ गाना जरूर सुना होगा, पर क्या आप जानते हैं कि यह फिल्मी गाने से पहले गुजरात का एक लोकप्रिय लोकगीत है? इसमें भी सबसे दिलचस्प बात कि इस गीत की जड़ें बंगाल के विश्वविख्यात लेखक रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ी हुई हैं।

अब आप सोच रहे होंगे कि गुजरात के गीत का बंगाल से आखिर क्या कनेक्शन, तो चलिए आपको इसका रोचक इतिहास बताते हैं।

पूर्व में बंगाल से पश्चिम में गुजरात कैसे पहुंचा एक लोकगीत?

हम सभी जानते हैं कि गुजरात और बंगाल की संस्कृति एक दूसरे के विपरीत है, लेकिन इसके बावजूद ये दो छोर आपस में आकर मिले। दो संस्कृतियों की इस यात्रा में सहारा बना गुजरात का एक मशहूर लोकगीत ‘मोर बनी थनगाट करे’। यह गीत रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता ‘नबावर्षा’ से लिया गया है। इसकी रचना टैगोर ने सन् 1900 में सिलाईदहा में प्रवास के दौरान की थी।

इस कविता की बात करें तो इसमें मानसून की पहली बारिश और उससे प्रकृति में होने वाले बदलाव का जिक्र मिलता है। कविता का सबसे खूबसूरत भाव वो है जब बारिश की खुशी में कवि का मन बिल्कुल एक मोर की तरह नाचना शुरू कर देता है

गुजरात के स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार ने दी गुजराती जुबान

गुजरात के महान साहित्यकार, कवि और स्वतंत्रता सेनानी झवेरचंद मेघाणी ने टैगोर की कविता को गुजराती भाषा में बदला। बता दें कि उन्हें गुजरात में राष्ट्रीय शायर का भी दर्जा मिला हुआ है। कहा जाता है कि साल 1920 में उन्होंने टैगोर के घर की यात्रा की थी, तब उन्होंने इस कविता को पहली बार सुना। मेघाणी इस कविता से इतने प्राभवित हुए कि इसकी पंक्तियां उनके मन में घर कर गईं।

इसका नतीजा यह निकला कि मेघाणी ने साल 1944 में ‘नबावर्षा’ से प्रेरणा लेकर एक नई रचना की, जिसका नाम ‘मोर बनी थनगट करे’ था। उन्होंने गुजराती में की गई इस नई रचना को अपने काव्य-संग्रह ‘रवींद्र-वीणा’ में स्थान दिया। इसके बाद गीत को आवाज देने और जन-जन तक पहुंचाने में प्रसिद्ध गुजराती लोक गायक हेमू गढ़वी का अहम योगदान रहा।

भाव वही बस अंदाज गुजराती

“मोर बनी थनगट करे” का मतलब है कि मोर जब खुश होता है, तो वह नृत्य करता है। यह भी टैगोर की कविता की तरह ही बारिश की खुशी में झूमने वाली भावना को दर्शाता है। इस लोकगीत पर गौर करने पर हम पाते हैं कि मेघाणी ने इस कविता का केवल गुजराती अनुवाद नहीं किया, बल्कि इसे चारण शैली में पेश करके पूरी तरह से  गुजराती लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया।

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