डल झील की पहचान सिर्फ शिकारे, हाउसबोट और पर्यटन से नहीं है। इसके भीतर और आसपास पीढ़ियों से बसे परिवार झील की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत का हिस्सा हैं। नाव चलाना, झील में सब्जियां उगाना और पर्यटन से जुड़े काम इन परिवारों की पारंपरिक आजीविका रही है, लेकिन पिछले करीब ढाई दशकों में जल निकायों से बस्तियां हटाने की नीति ने कई परिवारों को घर के साथ उनकी आजीविका से भी दूर कर दिया।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के मौजूदा शरदकालीन सत्र में नेशनल कन्फ्रेंस विधायक तनवीर सादिक की ओर से पेश जेएंडके लेकसाइड रेजिडेंट्स राइट टू इको-फ्रेंडली हाउसिंग बिल, 2026 ने इस पुरानी नीति पर नई बहस छेड़ दी है।
झील से दूरी ने छीना पारंपरिक रोजगार
पिछले वर्षों में डल समेत अन्य जल निकायों से लोगों को हटाकर पुनर्वासित किया गया। 1,800 से अधिक लोगों को श्रीनगर के बाहरी इलाके रक्ख-ए-अर्थ आवासीय कॉलोनी में बसाया गया। प्लॉट और मुआवजा मिलने के बावजूद झील से दूरी ने उनकी पारंपरिक आजीविका पर असर डाला।
वहां नाव चलाने, सब्जी उत्पादन और झील आधारित पर्यटन से जुड़े रोजगार के सीमित विकल्पों ने पुनर्वास को कई परिवारों के लिए मुश्किल बना दिया। इसके बाद कुछ परिवारों के झील की ओर लौटने की बात सामने आई।
डल झील की 58 बस्तियों पर नीति बनाने की मांग
डल झील में करीब 58 बस्तियां या मोहल्ले ऐसे बताए जाते हैं, जहां लोग लंबे समय से रह रहे हैं। कश्मीर हाउसबोट ओनर्स एसोसिएशन के चेयरमैन मंजूर पठान ने नीति को वैज्ञानिक आधार पर लागू करने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि आवास के नाम पर बड़े पैमाने पर झील भरने या नए निर्माण की छूट नहीं मिलनी चाहिए।
सड़क निर्माण के लिए फिलिंग के बजाय बैटरी चालित नावों को परिवहन का विकल्प, साथ ही सीवेज ट्रीटमेंट और प्रभावी ड्रेनेज व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
झील को नुकसान पहुंचाने वाले निर्माण पर रोक
मसौदे में झीलों को नुकसान पहुंचाने वाले निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी रोकने वाली गतिविधियों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव है। वहीं, सिर्फ झील के नजदीक होने के आधार पर निर्माण रोकने के बजाय उसके वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव को अनुमति का आधार बनाने की बात कही गई है।
प्रस्तावित कानून में स्थानीय निवासियों को संरक्षण प्रक्रिया का साझेदार बनाने पर भी जोर है। कचरा और सीवेज प्रबंधन, जल चैनलों की सुरक्षा, बाढ़ की तैयारी, पारंपरिक पर्यावरणीय तौर-तरीकों की बहाली और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण में उनकी भागीदारी प्रस्तावित है।
पर्यावरण-अनुकूल उपाय अपनाने वाले परिवारों को तकनीकी और वित्तीय सहायता देने का भी प्रावधान सुझाया गया है।
प्रस्तावित बिल के सामने सबसे बड़ी कसौटी
यह पहल ऐसे समय आई है जब जम्मू-कश्मीर के जल निकायों पर दबाव को लेकर चिंता बनी हुई है। पहली जल निकाय गणना में प्रदेश में करीब 9,765 जल निकाय दर्ज किए गए थे। कैग ने भी डल झील के सिकुड़ने, अतिक्रमण, अनुपचारित सीवेज और कमजोर निगरानी जैसे मुद्दों को रेखांकित किया है।
अब प्रस्तावित बिल के सामने सबसे बड़ी कसौटी यही है—क्या झील के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना उसके पारंपरिक बाशिंदों के घर, आजीविका और विरासत को कानूनी सुरक्षा दी जा सकती है?

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

