‘आतंकियों को वैधता देने के लिए न हो सुरक्षा परिषद की सदस्यता का इस्तेमाल’, UN में भारत का PAK-चीन पर निशाना

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भारत ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रतिबंधों से जुड़े फैसलों में ज्यादा पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग की। भारत ने कहा कि इस ताकतवर संस्था की सदस्यता का इस्तेमाल आतंकवादियों को वैध ठहराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। यह बात पाकिस्तान की आतंकवाद से निपटने की भूमिका पर परोक्ष रूप से की गई आलोचना थी।

बुधवार को परिषद के कामकाज के तरीकों पर हुई खुली बहस में यूएन में भारत की प्रभारी राजदूत योजना पटेल ने कहा कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने का मंच नहीं बननी चाहिए।

भारत ने क्या कहा?

न्यूज एजेंसी एएनआई के अनुसार, उन्होंने कहा, “सुरक्षा परिषद में मौजूदगी का इस्तेमाल आतंकवादियों को वैध ठहराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। चाहे उन्हें सूची से हटाने की कोशिश हो या फिर बिना किसी ठोस आधार या दस्तावेज के सिर्फ राजनीतिक कारणों से किसी अन्य संस्था को आतंकवादी संगठन घोषित करना हो।”

भारत लंबे समय से आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों को नामित करने के प्रस्तावों में पारदर्शिता की कमी की आलोचना करता रहा है। हालांकि मंजूरी मिली सूचियों को सार्वजनिक किया जाता है, लेकिन भारत ने इस बात की ओर इशारा किया है कि प्रस्तावों को क्यों खारिज किया जाता है या क्यों उन पर तकनीकी रोक लगाई जाती है, इसके कारण नहीं बताए जाते।

भारत ने किसकी ओर किया इशारा?

भारत ने पहले भी इस प्रक्रिया को छिपा हुआ वीटो कहा है और खास तौर पर 1267 अल-कायदा प्रतिबंध समिति के कामकाज की आलोचना की है। पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों को नामित करने की भारत की कोशिशों का भी विरोध हुआ है। परिषद के स्थायी सदस्य चीन ने कुछ प्रस्तावों को रोक दिया है या उन पर होल्ड लगा दिया है।

भारत ने की UNSC की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की मांग

भारतीय राजनयिक ने काउंसिल की सहायक संस्थाओं के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों की नियुक्ति में हो रही देरी पर भी चिंता जताई। साल 2026 के आठ महीने बीत जाने के बाद भी कई पद खाली पड़े हैं, जिनमें 1267 अल-कायदा और तालिबान प्रतिबंध समितियों की देखरेख करने वाले पद भी शामिल हैं।

उन्होंने नियुक्तियों को पूरा करने के लिए एक पक्की और बिना किसी समझौते वाली समय-सीमा तय करने की मांग की और कहा कि देरी से सहायक निकायों के कामकाज पर असर पड़ा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के चयन सहित प्रमुख प्रक्रियाओं में काउंसिल के चुने हुए, गैर-स्थायी सदस्यों की अधिक भागीदारी की भी मांग की।

पटेल ने तर्क दिया कि काउंसिल के ढांचे और कामकाज के तरीकों में 1945 (जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी) के बाद से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में आए बदलावों को शामिल करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि तब से संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता चार गुना बढ़ गई है। पटेल ने कहा, “1945 की दुनिया अब पूरी तरह बदल चुकी है।”

उन्होंने कहा, “80 साल पहले हुए एक संघर्ष का नतीजा हमेशा के लिए काउंसिल के गठन, कामकाज के तौर-तरीकों, दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली को तय नहीं कर सकता। इसमें बदलाव की जरूरत है और यह जल्द से जल्द होना चाहिए।”

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