ग्लोबल वॉर्मिंग दम तोड़ रहा झीलों का सेल्फ-क्लीनिंग सिस्टम, समुद्रों में बढ़ेगा डेड जोन का खतरा

धरती पर मौजूद झीलें केवल पानी इकट्ठा करने के प्राकृतिक स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति के एक बेहतरीन फिल्टर की तरह भी काम करती हैं। इन्हें पर्यावरण की सेल्फ-सफाई मशीन कहा जा सकता है, जो पानी में घुली अत्यधिक नाइट्रोजन को खुद-ब-खुद साफ करने की क्षमता रखती हैं।

यही अनूठी प्रक्रिया हमारी नदियों, झीलों और अंततः महासागरों के पूरे इकोसिस्टम का संतुलन बनाए रखती है। हालांकि, इंसानी गतिविधियों के कारण हो रहा जलवायु परिवर्तन अब इस प्राकृतिक सफाई तंत्र के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन गया है।

क्या है डिनाइट्रीफिकेशन?

स्विट्जरलैंड की प्रसिद्ध बाल्डेगर झील पर किए गए एक हालिया वैज्ञानिक शोध से कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, सर्दियों के मौसम में जब झील के अलग-अलग तापमान वाली पानी की परतें आपस में मिश्रित होती हैं, तो वहां डिनाइट्रीफिकेशन नामक एक बेहद महत्वपूर्ण प्रक्रिया तेजी से सक्रिय हो जाती है।

इस प्रक्रिया के तहत पानी में मौजूद सूक्ष्मजीव नुकसानदेह और अतिरिक्त नाइट्रोजन को सोखकर उसे डायनाइट्रोजन गैस में परिवर्तित कर देते हैं। इसके बाद यह गैस सुरक्षित रूप से वायुमंडल में छोड़ दी जाती है, जिससे पानी का प्रदूषण प्राकृतिक रूप से साफ हो जाता है।

छोटी होती सर्दियां बन रही बड़ी वजह

ग्लोबल वार्मिंग के चलते अब दुनिया भर में सर्दियों का समय लगातार छोटा होता जा रहा है। सर्दियों की अवधि घटने का सीधा असर झीलों के पानी की परतों के आपस में मिलने की प्रक्रिया पर पड़ रहा है।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि आने वाले समय में पानी के आपस में मिलने का यह समय करीब 27 दिन तक कम हो सकता है। समय की इस भारी कमी के कारण झीलों के सूक्ष्मजीवों को नाइट्रोजन साफ करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाएगा, जिससे उनकी शुद्धिकरण क्षमता बेहद कमजोर हो जाएगी।

समुद्रों में बढ़ेगा डेड जोन का खतरा

यदि झीलें इस अतिरिक्त नाइट्रोजन को रोकने और साफ करने में विफल रहती हैं, तो यह दूषित पानी नदियों के माध्यम से सीधे समुद्रों तक पहुंच जाएगा। पानी में नाइट्रोजन की भारी मात्रा होने के कारण समुद्री सतह पर हानिकारक शैवाल बहुत तेजी से फैलने लगेंगे।

यह अत्यधिक शैवाल पानी की सारी ऑक्सीजन सोख लेते हैं, जिससे जल में ऑक्सीजन का स्तर शून्य के करीब पहुंच जाता है। ऐसे ऑक्सीजन विहीन क्षेत्रों को डेड जोन कहा जाता है, जहां मछलियां और अन्य समुद्री जीव घुट-घुट कर मर जाते हैं और वहां जीवन पूरी तरह असंभव हो जाता है।

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