1988 अहमदाबाद विमान हादसा, 37 साल बाद भी मुआवजे और इंसाफ के लिए भटक रहे पीड़ित परिवार

19 अक्‍टूबर 1988 को भी अहमदाबाद एयरपोर्ट के एक विमान हादसा हुआ था। मुंबई से अहमदाबाद आया आईसी 131 विमान रनवे के बजाए जमीन पर उतर गया था, जिसमें 133 यात्रियों की मौत हो गई थी। मृतकों की याद में कोतरपुर में स्‍म्रति वन बना दिया लेकिन न्‍याय व मुआवजे के लिए आज भी पीडित परिवार संघर्ष कर रहे हैं।

न्‍यायालय के आदेश पर पीडित परिवारों को पांच से छह लाख रुपुये का मुआवजा मिला। पीडितों को न्‍याय के लिए संघर्ष कर रहे पंकेश पटेल का दावा है कि कई वर्ष तक न्‍याय के लिए संघर्ष करने व उनकी वस्‍तुओं के नुकसान के बदले करीब 87 लाख 70 हजार रुपये तक का मुआवजा बनता था, आज यह रकम सवा दो करोड रुपये के करीब होती है।

कैसे हुआ था 19 अक्टूबर 1988 को हो हादसा?

जून 2025 को हुए हादसे के बाद एक बार फिर बोइंग कंपनी के विमान पर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, 1988 में हुए हादसे का दोष पायलट पर डाल दिया गया इसलिए विमान निर्माता कंपनी मुआवजे से साफ बच निकली।

पंकेश पटेल बताते हैं कि हवाई अड्डा प्राधिकरण की लापरवाही भी सामने आई थी, एयरपोर्ट के पास कोतरपुर वाटर वर्क्‍स में काम चल रहा था जहां फ्लड लाइट जल रही थी, बताया जाता है कि पायलट उन्हें रनवे की लाइट समझकर विमान वहां उतार दिया जिससे वह हादसा हुआ था।

2025 हादसे में भी नहीं मिला है कुछ लोगों को मुआवजा

एक तरफ जहां एअर इंडिया और टाटा समूह अधिकांश परिवारों को मुआवजा देने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विश्वास कुमार और अहमदाबाद के अजय परमार जैसे सर्वाइवर्स आज भी अधूरे मुआवजे, मानसिक आघात (PTSD) और सामाजिक उपेक्षा के कारण नरकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

विमान में मरे कुछ बिट्रिश नागरिकों के परिजनों का आरोप है कि ब्रिटिश नागरिक होने के कारण मुझे या अन्य ब्रिटिश पीड़ित परिवारों को यूके सरकार से मदद नहीं मिली। इसको लेकर एअर इंडिया का कहना है कि मृतकों के 96% परिवारों को 25 लाख अंतरिम मुआवजा दे दिया गया है। बाकि 4 प्रतिशत मामलों में दस्तावेज अधूरे या पारिवारिक विवाद के कारण फंसे हैं।

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