क्या है संविधान का अनुच्छेद 329, जिसका हवाला देकर SC ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने नामांकन खारिज करने के रिटर्निंग आफीसर के आदेश को चुनौती देने वाली मीनाक्षी नटराजन की याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी।

कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्हें जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव याचिका दाखिल करने की छूट दी है।

क्यों खारिज हुई याचिका?

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और एएस चंदुरकर की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 329 के प्रतिबंध का हवाला देते हुए अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई नटराजन की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।

हालांकि इससे पहले कोर्ट ने नटराजन के वकील अभिषेक मनु सिंघवी, प्रतिपक्षी वकील मुकुल रोहतगी, कनु अग्रवाल, चुनाव आयोग की ओर से डीएस नायडू व मध्य प्रदेश सरकार की ओर से तुषार मेहता की दलीलें सुनीं।

कांग्रेस ने क्या दिया था तर्क?

अभिषेक मनु सिंघवी ने रिटर्निंग आफीसर के नामांकन खारिज करने के आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 33ए कहती है कि दो साल से अधिक सजा वाले अपराध या जिन आपराधिक मामलों में अदालत ने आरोप तय कर दिये हों उनका ब्योरा हलफनामे में देना होगा।

लेकिन जिस केस का खुलासा न करने के लिए रिटर्निंग आफीसर ने नामांकन रद किया है उसमें अदालत से आरोप तय नहीं हुए हैं। न ही अदालत ने संज्ञान लिया है अभी सिर्फ कोर्ट ने एक निजी शिकायत पर उन्हें समन जारी किया है।

क्या बोले बीजेपी के वकील?

जबकि प्रतिवादी बीजेपी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने सिंघवी की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि चुनाव लड़ना विधायी अधिकार है यह कोई मौलिक अधिकार नहीं है। ऐसे में इस संबंध में अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई नहीं कर सकता क्योंकि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर दाखिल की जाती है।

रोहतगी का कहना था कि ऐसी किसी भी याचिका पर सुनवाई करने पर अनुच्छेद 329 स्पष्ट रूप से रोक लगाता है। उन्होंने यह भी कहा कि नियम के मुताबिक हलफनामे में सभी लंबित आपराधिक मामलों का ब्योरा देना होता है सिर्फ उन मामलों का नहीं जिनमें आरोप तय हुए हों।

हालांकि अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल रिट याचिका पर सुनवाई पर सिंघवी की दलील थी कि अगर नामांकन खारिज करने में स्पष्ट रूप से गलती हुई है तो सुप्रीम कोर्ट पूर्ण न्याय करने के लिए अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल याचिका पर सुनवाई कर आदेश दे सकता है।

क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

लेकिन सुप्रीम कोर्ट सिंघवी की दलीलों से सहमत नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि अगर सिंघवी की दलीलें स्वीकार की जाती हैं तो इसका मतलब है कि जिन मामलों में नामांकन खारिज होने में स्पष्ट गलती है तो कोर्ट उन्हें अनुच्छेद 32 और 226 के तहत दाखिल याचिकाओं में सुन सकता है, और जहां नामांकन खारिज होना पहली निगाह में स्पष्ट तौर पर उतना गलत नहीं है उन्हें चुनाव याचिकाओं के लिए भेज दिया जाए, ऐसा करने का मतलब है कि कोर्ट एक ऐसा सिद्धांत तय कर रहा है जिसका जिक्र अनुच्छेद 329 में नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि इस व्याख्या को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। यह कहते हुए कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। हालांकि कोर्ट ने नटराजन को चुनाव याचिका दाखिल करने की छूट देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में कोर्ट ने केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

रिटर्निंग आफीसर अरविंद शर्मा ने गत नौ जून को मीनाक्षी नटराजन का नामांकन इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उन्होंने नामांकन के साथ दिए गए फार्म 26 के हलफनामे में तेलंगाना की एक अदालत में उनके खिलाफ लंबित निजी शिकायत के केस का ब्योरा नहीं दिया था। नटराजन ने पहले इस संबंध में चुनाव आयोग को ज्ञापन दिया जब चुनाव आयोग से कोई जवाब नहीं मिला तो नटराजन ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल की थी।

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