जम्मू की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में एक साल सात महीने से अधिक समय तक जेल में बंद रहे व्यक्ति को बरी करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित नहीं हो सके और जांच में गंभीर खामियां थीं।
यह फैसला न्यायाधीश अमरजीत सिंह लांगेह ने सुनाया। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि कथित अपराध हुआ था। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की कहानी को “बेहद असंभव” और तथ्यों से असमर्थित बताया।
आरोपी एक साल, सात महीने और ग्यारह दिन जेल में रहने के बाद सभी आरोपों से बरी हुआ। कोर्ट ने अभियोजन के मामले में कई बड़े विरोधाभास गिनाए, जिनमें पुष्टिकारक मेडिकल साक्ष्य का अभाव, एफआईआर दर्ज कराने में अस्पष्ट देरी और जांचकर्ताओं द्वारा जरूरी भौतिक साक्ष्य जुटाने में विफलता शामिल है।
जांच में गंभीर खामियां और लापरवाही
फैसले में कहा गया कि बार-बार यौन उत्पीड़न के आरोपों के बावजूद, केस दर्ज होने के तुरंत बाद कराई गई मेडिकल जांच में जबरदस्ती, चोट या हाल में यौन संबंध के कोई निशान नहीं मिले। जांच की आलोचना करते हुए कोर्ट ने कहा कि अहम सबूतों को नजरअंदाज किया गया, सीसीटीवी फुटेज का ठीक से विश्लेषण नहीं हुआ, प्रमुख गवाहों से पूछताछ नहीं की गई और जांच लापरवाही व छेड़छाड़ के साथ की गई प्रतीत होती है।
शिकायतकर्ता पर झूठी सूचना का केस
इन गंभीर कमियों का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने आईजीपी जम्मू को मामले के जांच अधिकारी (आईओ) और तत्कालीन थाना प्रभारी (एसएचओ) के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने एसएसपी जम्मू को भी शिकायतकर्ता के खिलाफ झूठी सूचना देने के आरोप में कानूनी कार्यवाही शुरू करने को कहा।
साथ ही, केस दर्ज कराने में कथित तौर पर मदद करने वाले दो लोगों की भूमिका की जांच के आदेश दिए गए, और कदाचार साबित होने पर आपराधिक कार्रवाई करने को कहा गया। अभियोजन पक्ष की ओर से अधिवक्ता अजय डोगरा पेश हुए, जबकि आरोपी की पैरवी अधिवक्ता अनिल शर्मा ने की।


