पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 26 वर्ष पुराने एक सड़क हादसे के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) के उस आदेश को अवैध करार दिया है, जिसमें दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति के पीछे बैठे सवार (पिलियन राइडर) को भी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार मान लिया गया था।
जस्टिस अमरिंदर सिंह ग्रेवाल ने स्पष्ट कहा कि किसी दोपहिया वाहन पर पीछे बैठे व्यक्ति को किसी भी स्थिति में चालक द्वारा की गई ओवरटेकिंग या अचानक मोड़ लेने की कार्रवाई के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामला 10 जुलाई 2000 का है। रोहतक निवासी जय कंवर अपने परिचित मनोज कुमार द्वारा चलाए जा रहे स्कूटर पर पीछे बैठे हुए असन गांव की ओर जा रहे थे। जब वे सोनीपत रोड पर पहुंचे तो उनके आगे चल रही एक जीप के चालक ने बिना कोई संकेत दिए अचानक ब्रेक लगा दिए। टक्कर से बचने के लिए स्कूटर चालक ने जीप को ओवरटेक करने का प्रयास किया।
इसी दौरान सामने से तेज रफ्तार आ रही टाटा सूमो ने स्कूटर को टक्कर मार दी। हादसे में जय कंवर गंभीर रूप से घायल हो गए। करीब 20 दिन अस्पताल में उपचार के बाद 30 जुलाई 2000 को उनकी मृत्यु हो गई।
दुर्घटना के संबंध में रोहतक के सदर थाने में एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन बाद में एमएसीटी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि दुर्घटना स्कूटर चालक की लापरवाही से हुई थी और आरोपित वाहन चालकों की लापरवाही साबित नहीं हो सकी। न्यायाधिकरण ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत मुआवजा देने से इनकार करते हुए केवल ‘नो फाल्ट लाइबिलिटी’ के आधार पर 50 हजार रुपये देने का आदेश दिया था।
मृतक के परिवार की ओर से हाई कोर्ट में दलील दी गई कि न्यायाधिकरण ने जीप चालक द्वारा अचानक ब्रेक लगाने और टाटा सूमो चालक की तेज एवं लापरवाह ड्राइविंग को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने यह भी बताया कि जय कंवर हरियाणा विद्युत बोर्ड में कैशियर-कम-क्लर्क के पद पर कार्यरत थे और उनकी मासिक आय 7,591 रुपये थी। उनके निधन से पत्नी और दो नाबालिग पुत्रों का सहारा छिन गया।
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि स्कूटर चालक ओवरटेकिंग के दौरान लापरवाह था, तब भी उसकी लापरवाही स्वत: पीछे बैठे मृतक पर नहीं थोपी जा सकती। अदालत ने कहा कि रिकार्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि जय कंवर ने दुर्घटना में किसी प्रकार का योगदान दिया था।
अदालत ने एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी को भी महत्वहीन बताते हुए कहा कि किसी परिवार के लिए प्रियजन की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार और शोक की प्रक्रिया प्राथमिक होती है। मृतक की आयु, आय और आश्रितों की संख्या को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने कुल 12.92 लाख रुपये मुआवजा निर्धारित किया और एमएसीटी के आदेश में संशोधन करते हुए संबंधित पक्षों को यह राशि अदा करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि मृतक की कोई गलती न होना दोषियों की जिम्मेदारी को कम नहीं बल्कि और अधिक स्पष्ट करता है।


